भीमा कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ व दलित उत्पीड़न
भीमा कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ व दलित उत्पीड़न
भीमा कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ (1 जनवरी 2018) पर हुई हिंसात घटना भारतीय राजनीति, समाजशास्त्र और न्यायपालिका के दृष्टिकोण से एक अत्यंत जटिल और बहुआयामी विषय है। इसकी विस्तृत विवेचना नीचे दिए गए बिंदुओं के आधार पर की जा सकती है:
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
भीमा कोरेगांव की महत्ता को समझे बिना 2018 की घटना का विश्लेषण अधूरा है। 1 जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध में 'महार' रेजिमेंट के सैनिकों ने पेशवा की विशाल सेना का मुकाबला किया था यह सैनिक मात्र 500 थे। दलित विमर्श में इसे ब्राह्मणवादी पेशवा शासन के अत्याचारों के विरुद्ध एक 'मुक्ति संग्राम' के रूप में देखा जाता है। भीमा कोरेगांव की लड़ाई (1 जनवरी 1818) भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसे अलग-अलग नजरियों से देखा जाता है। जहाँ सैन्य इतिहास में यह तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध की एक निर्णायक लड़ाई थी, वहीं सामाजिक स्तर पर यह दलित अस्मिता और जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गई है।
इस युद्ध का मुख्य कारण क्या था। पेशवा शासन उस समय पुणे में पेशवा बाजीराव द्वितीय का शासन था। इतिहासकारों के अनुसार, पेशवाओं के समय में जातिगत भेदभाव चरम पर था, जहाँ दलितों (विशेषकर महारों) के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। कहा जाता है कि महार सैनिकों ने पहले पेशवा की सेना में शामिल होने की पेशकश की थी, लेकिन अछूत होने के कारण उन्हें ठुकरा दिया गया। इसके बाद वे ब्रिटिश सेना (बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री) में शामिल हो गए। 1 जनवरी 1818 को भीमा नदी के किनारे कोरेगांव में यह ऐतिहासिक संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में पेशवा बाजीराव द्वितीय की विशाल सेना में लगभग 28,000 सैनिक (पैदल और घुड़सवार) थे। दूसरी जिनमें से लगभग 500 महार सैनिक थे। जब पूरा देश नए वर्ष का जश्न मना रहा था तब उसे समय 500 लोगों की एक छोटी सी टुकड़ी जिसे महार सेना के नाम से भी इतिहास में जाना जाता है उसने पेशवा बाजीराव द्वितीय की विशाल सेना में लगभग 28,000 हजार से अधिक सैनिकों के साथ केवल 500 महार सैनिक लड़े और विजय हासिल की। इसका महारों के इतिहास में कोई सानी नहीं है। लगातार 12 घंटे तक न रुकते हुए, बिना भोजन और पानी के महार सैनिकों ने लड़कर युद्ध जीता और अपने शौर्यता का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। इस अभूतपूर्व प्रदर्शन की कीर्ति सारे विश्व में प्रज्वलित की इसी वीरता के कारण ब्रिटिशों द्वारा कोरेगांव की भीमा नदी के तट पर एक 60 फीट ऊंचा स्मारक स्तम्भ बनवाया। इस स्तम्भ के चारों ओर लगी संगमरमर की पट्टिकाओं पर अंग्रेजी और मराठी में लिखा हुआ है, उस पर लिखा है 23 - "One of the proudest triumphs of the British Army in the East" "पूर्व में ब्रिटिश आर्मी के सबसे गौरवपूर्ण विजय अभियानों में से एक की याद में।" पर दुर्भाग्य की बात है कि बाहर से आने वाले अंग्रेज महारों की बहादुरी कुछ समझ गए लेकिन अपने ही देश के रहने वाले स्वर्ण समाज के लोग महारो की बहादुरी कुछ समझ ना सके जिसका परिणाम उन्हें अपने साम्राज्य को अंत करके समझाना पड़ा इसी कारण से 1 जनवरी के दिन शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है और यह माना जाता है कि "मुट्ठी भर महार सैनिकों ने अदम्य साहस दिखाते हुए पेशवा की विशाल सेना को हारा दिया इस प्रकार की हार और महार सेना के विजय का उत्सव का दिन था। इस युद्ध को केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि "अछूतों की ब्राह्मणवादी पेशवा सत्ता पर जीत" के रूप में देखा जाता है। इस हार ने मराठा साम्राज्य के पतन को तेज कर दिया और पेशवा शासन का अंत हुआ। दलित समुदाय इसे अपनी वीरता और आत्म-सम्मान की जीत मानता है। उनका तर्क है कि यह लड़ाई उन्होंने अंग्रेजों को जिताने के लिए नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ लड़ी थी। युद्ध के बाद, अंग्रेजों ने मारे गए सैनिकों की याद में कोरेगांव भीमा में एक विजय स्तंभ (Obelisk) बनवाया। इस पर उन सैनिकों के नाम अंकित हैं जिन्होंने इस युद्ध में अपने प्राण न्योछावर किए थे, जो सभी माहर समुदाय के थे।
1 जनवरी 1818 को भीमा नदी के किनारे महार बनाम पेशवाई साम्राज्य के युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए सैनिकों के नाम के साथ-साथ जख्मी हुए सैनिकों के नाम इस प्रकार से हैं। कोरेगांव की लड़ाई में वीरगति प्राप्त सैनिकों के नाम', - सोननाक कमलनाम, रामनाक येसनाक (पद का नाम नाईक) और गोंदनाक कोढेनाक, रामनाक येसनाक, भागनाक हरनाक, अंबरनाक काननाक, रूपनाक लखनाक, गणनाक बाळनाक, काळनाक कोंडनाक, वपनाक रामनाकसिपाई, विटनाक धामनाक, राजनाक गणनाक, वपनाक हरनाक, रैनाक बाननाक, गणनाक धरमनाक, देवनाक आननाक, गोपालनाक बालनाक, हरनाक हिरनाक, जेठनाक दैनाक और गणनाक लखनाक (सिपाही पद का नाम) उपरोक्त यह सभी अमर शहीदों के नाम है जिन्होंने स्वाभिमान की खातिर अपने आप को समाज के लिए कुर्बान कर दिया तथा जख्मी हुए तीन वीर सैनिक :- जाननाक हिरनाक, भीकनाक रतननाक और रतननाक धाकनाक (सिपाही पदका नाम)
1 जनवरी 1927 का दिन भीमा कोरेगांव के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। इसी दिन डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर पहली बार भीमा नदी के किनारे बने उस विजय स्तंभ (Victory Pillar) पर पहुंचे थे। बाबासाहेब ने इस दिन को और इस स्थान को लेकर जो बातें कहीं, उनका संक्षेप में विवरण कुछ इस प्रकार से है: बाबासाहेब ने क्या कहा था? बाबासाहेब ने वहां उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यह विजय स्तंभ केवल अंग्रेजों की जीत का स्मारक नहीं है, बल्कि यह महार सैनिकों के अदम्य साहस और वीरता का प्रतीक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुट्ठी भर महार सैनिकों ने पेशवा की विशाल सेना को हराकर यह साबित कर दिया था कि वे किसी भी तरह से कमतर नहीं हैं। उन्होंने इस लड़ाई को 'अछूतों की ब्राह्मणवादी पेशवा सत्ता के विरुद्ध जीत' के रूप में परिभाषित किया। बाबासाहेब का मानना था कि यह युद्ध केवल राज्य विस्तार के लिए नहीं, बल्कि उन अमानवीय सामाजिक प्रतिबंधों के खिलाफ था जो पेशवा शासन में दलितों पर थोपे गए थे। बाबासाहेब ने खेद जताया कि जिस वीरता ने इतिहास की दिशा बदल दी, उसे समाज और इतिहास ने भुला दिया था। उन्होंने दलितों को अपने पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को याद रखने और उससे प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
एल्गार परिषद साल 2018 में इस युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के दौरान हिंसा हुई थी, जिसके बाद 'एल्गार परिषद' जैसे मामले सामने आए और यह स्थान राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया।
एल्गार परिषद (Elgar Parishad) एक बड़ा सम्मेलन था जो 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित किया गया था। 'एल्गार' शब्द का अर्थ है 'जोरदार घोषणा' की गई थी इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ मनाना था, जहाँ 1818 में दलित सैनिकों (महार रेजिमेंट) वाली ब्रिटिश सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना को हराया था। एल्गार परिषद के मुखिया कौन थे? एल्गार परिषद का आयोजन किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि 250 से अधिक प्रगतिशील और दलित संगठनों ने मिलकर किया था। हालांकि, इसके पीछे मुख्य नेतृत्व और चेहरे निम्नलिखित थे: न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जो इस आयोजन के मुख्य आयोजकों में से एक थे। न्यायमूर्ति बी.जी. कोलसे पाटिल बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जिन्होंने इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रकाश अंबेडकर जो वंचित बहुजन आघाड़ी के नेता, जो इस आयोजन के प्रमुख वक्ताओं और समर्थकों भी शामिल थे।
2018 की हिंसा और घटनाक्रम और तात्कालिक कारण
2018 में इस युद्ध के 200 वर्ष पूरे हो रहे थे, इसलिए उत्सव का पैमाना बहुत बड़ा था। लेकिन इस दौरान शांतिपूर्ण माहौल अचानक हिंसा में बदल गया। हिंसा की शुरुआत से कुछ दिन पहले पास के गांव वढू बुद्रुक में 'गोविंद गोपाल महर' और 'छत्रपति संभाजी महाराज' के अंतिम संस्कार को लेकर दो समुदायों के बीच ऐतिहासिक दावों पर विवाद हुआ। इसने क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव पैदा कर दिया। 1 जनवरी की सुबह जब श्रद्धालु विजय स्तंभ की ओर बढ़ रहे थे, तब वहां भगवा झंडे लिए हुए बीजेपी आरएसएस के समूहों ने विजय दिवस का जश्न मना रहे लोगों के बीच पथराव और झड़प शुरू हो गई। इसमें एक व्यक्ति की मौत हुई और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा और उन पर पथराव किया गया और वाहनों में आग लगा दी गई। इस हिंसा में एक युवक (राहुल फटांगले) की जान चली गई। इस घटना को कुछ इस प्रकार से देखा जा सकता है कि यह हिंसा सदियों पुराने जातीय गौरव बनाम क्षेत्रीय अस्मिता के टकराव और स्थानीय स्तर पर फैले भ्रामक दावों (वधु बुद्रुक विवाद) का परिणाम थी। आलोचकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जुटने के बावजूद पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए थे, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।
प्रथम सूचना रिपोर्ट और दलित उत्पीड़न सरकार द्वारा
इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट 2 जनवरी 2018 को अनीता साल्वे एक दलित कार्यकर्ता जो की 1 जनवरी की हिंसा की चश्मेडीड गवाह ने प्रथम सूचना रिपोर्ट निकटतम थाने में दर्ज करवाया था फिर में या आप था कि एक हथियार बंद में दलितों पर हमला किया फिर में हमले की षड्यंत्रकारी के तौर पर संभाजी भिंडी और मिलिंद एकबोटे को अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामित किया था जो की शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान और हिंदू एकता अगड़ी नमक वामपंथी हिंदुत्व संगठनों के अगुवा है। इसके प्रथम सूचना रिपोर्ट काउंटर ब्लास्ट में सवर्ण समाज ने 8 जनवरी 2018 को एक और प्रथम सूचना रिपोर्ट पुणे के एक छोटे कंस्ट्रक्शन व्यापारी तुषार दामगुड़े ने लिखवाई तुषार धाम गुड राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के करीबी जाने जाते हैं और अपने ब्लॉक पर वामपंथी विरोधी पोस्ट लिखने में काफी वक्त बिताते हुए प्रतीत होते थे उन्होंने अपनी फिर में यह आरोप लगाया कि 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद ने सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दिए गए भाषण के कारण 1 जनवरी को बीमा कोरेगांव में हुई हिंसा भड़की किंतु हिंसा भड़काने के बाद दो तरफ से फिर दर्ज हुई पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट अनीता सांवले द्वारा दिनांक 2 जनवरी 2018 को दर्ज करवाई गई और दूसरी प्रथम सूचना रिपोर्ट तुषार दामगुड़े द्वारा 8 जनवरी 2018 को दर्ज करवाई गई जिसका विवरण कुछ इस प्रकार से है-
प्रथम FIR - हिंसा भड़काने वाले लोगों के विरुद्ध 2 जनवरी, 2018 को अनीता साल्वे द्वारा पुणे के पिंपरी पुलिस स्टेशन (बाद में शिक्रापुर स्थानांतरित) में दर्ज कराई गई FIR (क्रमांक 02/2018) भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की पहली और सबसे महत्वपूर्ण FIR मानी जाती है।यह FIR मुख्य रूप से उन हिंदुत्ववादी नेताओं के खिलाफ थी, जिन पर भीमा कोरेगांव में दलित समुदाय पर हमला करने और साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। नामजद मुलजिम (Named Accused) अनीता साल्वे की इस FIR में मुख्य रूप से 2 लोगों को नामजद (Accused) बनाया गया था संभाजी भिड़े (संस्थापक, शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान) और मिलिंद एकबोटे (कार्यकारी अध्यक्ष, समस्त हिंदू अघाड़ी) अनीता साल्वे ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उन्होंने भीमा कोरेगांव के पास वढू बुद्रुक में इन नेताओं के अनुयायियों को केसरिया झंडे लिए हुए हमला करते और हिंसा फैलाते देखा था। इस शिकायत के बाद पुलिस द्वारा आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य विशेष अधिनियमों के तहत अत्यंत गंभीर धाराएं लगाई गई थीं- धारा 307 (हत्या का प्रयास), 143, 147, 148, 149: गैरकानूनी जनसमूह (Unlawful Assembly) और दंगे (Rioting) से संबंधित, धारा 295(A): धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य, धारा 435, 436: आग या विस्फोटक पदार्थ द्वारा शरारत (Arson/आगजनी), धारा 120-B: आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (Atrocities Act): धारा 3(2)(v) और 3(1)(10) के तहत जातिगत आधार पर हिंसा और अपमान के आरोप तथा हथियार अधिनियम (Arms Act): धारा 4(25) के तहत अवैध हथियार रखने या उनका उपयोग करने के आरोप इनमें से कुछ धारा बाद में जांच के दौरान जांच अधिकारी द्वारा जोड़ी गई थी। मिलिंद एकबोटे: उन्हें इस मामले में मार्च 2018 में गिरफ्तार किया गया था, हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई और संभाजी भिड़े: पुलिस ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया, जिसे लेकर बाद में काफी विवाद और विरोध प्रदर्शन भी हुए।
दूसरी FIR - तुषार दामगुड़े की 8 जनवरी 2018 को FIR से अलग दर्ज करवाई थी, क्योंकि अनीता साल्वे की FIR हिंसा के "हिंदुत्ववादी पक्ष' पर केंद्रित थी, जबकि दामगुड़े की FIR "एल्गार परिषद और माओवादी संबंध" पर केंद्रित कर दी गई थी। और इस प्रथम सूचना रिपोर्ट में जो आरोप तुषार दामगुड़े द्वारा लगाया गया वह पूर्ण रूप से फर्जी और मनगढ़ंत कहानियां द्वारा संबंधित थाने में दर्ज कराई थी। जिसका विवरण कुछ इस प्रकार से दिया जा रहा है। भीमा कोरेगांव के कार्यक्रम में हिंसा भड़काने वाले वर्ग के द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट जो कि व्यवसायी तुषार दामगुड़े द्वारा दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR No. 0004/2018) में शुरुआत में कुल 6 लोगों को अभियुक्त (नामजद) बनाया गया था। यह FIR मुख्य रूप से 31 दिसंबर, 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित एल्गार परिषद के कार्यक्रम और उसमें दिए गए भाषणों पर केंद्रित थी। FIR में नामजद 6 अभियुक्तों की सूची: सुधीर ढवले (रिपब्लिकन पैंथर्स के कार्यकर्ता), सागर गोरखे (कबीर कला मंच के सदस्य), रमेश गायचोर (कबीर कला मंच के सदस्य), ज्योति जगताप (कबीर कला मंच के सदस्य), हर्षाली पोतदार (रिपब्लिकन पैंथर्स की कार्यकर्ता), दीपक डेंगले (कबीर कला मंच के सदस्य) इस दूसरी प्रथम सूचना रिपोर्ट पर पुलिस ने बहुत ही त्वरित गति से कार्रवाई की और इस कार्यवाही का परिणाम यह रहा की पुलिस और सरकार तथा हिंदू संगठन (आरएसएस व अन्य दल) के लोगों ने मिलकर षड्यंत्र के तहत इस प्रथम सूचना रिपोर्ट की जांच के नाम पर भीमा कोरेगांव के कार्यक्रम के प्रमुख लोगों पर जो प्रथम सूचना रिपोर्ट की जांच की पूरी दिशा पुलिस ने यह कहकर बदल दी की इनका संबंध माओवादी गुट से है इसी कारण से इन्हें नक्सली भी घोषित कर दिया गया और जांच की पूरी दिशा बदल दी गई जिसके कारण दलित उत्पीड़न शुरू कर दिया और यह उत्पीड़न इस तरह से शुरू हुआ कि महाराष्ट्र ही नहीं इस जांच की चपेट में अन्य राज्य के लोग भी आ गए और पुलिस ने अन्य राज्यों के लोगों की भी गिरफ्तारियां शुरू कर दी इस प्रकार की त्वरित गति अनीता साल्वे (दलित महिलाकार्यकर्ता) की प्रथम सूचना रिपोर्ट पर कार्यवाही नहीं की गई FIR के मुख्य बिंदु यह था कि शिकायतकर्ता तुषार दामगुड़े ने आरोप लगाया कि एल्गार परिषद में इन लोगों ने भड़काऊ भाषण दिए, उत्तेजक गीत गाए और ऐसी सामग्री वितरित की जिससे समाज में वैमनस्य फैला और 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई। तथा दूसरा दावा किया गया था कि ये कलाकार और कार्यकर्ता प्रतिबंधित संगठन CPI (माओवादी) के निर्देशों पर काम कर रहे थे तो स्थानीय पुलिस द्वारा शुरुआत में इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153(A), 505(1)(b), और 117 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
पुलिस ने दोनों प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के उपरांत तुषार दामगुड़े की प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामजद लोगों के सिवा इन लोगों पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के अंतर्गत इनका नामजद किया महेश राऊत, शोमा सेन, सुधीर ढवले(वरिष्ठ दलित कार्यकर्ता और मराठी भाषा की प्रगतिशील पत्रिका के संपादक), सुरेन्द्र गडलिंग (नागपुर के रहने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता जिनका नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट में नहीं था इनका भी पुलिस ने जांच के नाम पर उत्पीड़न किया),रोना विल्सन (यह दिल्ली के मानवाधिकार कार्यकर्ता थे उनके घर पर भी छापा मारा और पुलिस ने जांच के नाम पर उत्पीड़न किया), अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, वर्नन गोज़ाल्विस, आनंद तेलतुंबड़े, गौतम नवलख, हेनी बाब, रमेश गायचोर, सागर गोरखे, ज्योति जगताप, फादर स्टैन स्वामी जबकि उपरोक्त यह सभी लोग समाजसेवी दलित व आदिवासी और के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले लोग थे और इनमें से अधिकतर लोग शिक्षित वर्ग से आते हैं इनमें से कुछ लोगों का विवरण निम्न इस प्रकार से दिया जा रहा है।
इस मामले में न्यायालय की प्रतिक्रिया क्या रही ?
Romila Thapar vs Union Of India on 28 September 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का 28 सितंबर, 2018 का निर्णय नागरिक अधिकारों और पुलिस की शक्तियों के बीच संतुलन को लेकर एक ऐतिहासिक चर्चा थी। यह मामला मुख्य रूप से भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं (वरुण गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, पी. वरवरा राव और गौतम नवलखा) की गिरफ्तारी से संबंधित था।
इस याचिका में प्रमुख रूप से सिर्फ पांच याची कर्ता रोमिला थापर (प्रसिद्ध इतिहासकार और मुख्य याचिकाकर्ता), देवकी जैन (अर्थशास्त्री और नारीवादी कार्यकर्ता), प्रभात पटनायक (प्रसिद्ध अर्थशास्त्री), सतीश देशपांडे (समाजशास्त्री), माजा दारूवाला (मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील)
इतिहासकार रोमिला थापर और अन्य याचिकाकर्ताओं के द्वारा अधिवक्ता यह मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का अधिकार :- याचिकाकर्ताओं का सबसे प्रमुख तर्क यह था कि असहमति (Dissent) लोकतंत्र का एक "सेफ्टी वाल्व" है। उन्होंने तर्क दिया कि केवल इसलिए कि ये कार्यकर्ता सरकार की नीतियों के आलोचक थे, उन्हें "शहरी नक्सल" कहकर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
मनमानी गिरफ्तारी और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन :- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि महाराष्ट्र पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारियां पूरी तरह से मनमानी थीं। उन्होंने कहा कि यह अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि पुलिस के पास इन व्यक्तियों को सीधे हिंसा से जोड़ने के पर्याप्त सबूत नहीं थे।
निष्पक्ष जांच की मांग (SIT की आवश्यकता) :- याचिकाकर्ताओं ने महाराष्ट्र पुलिस की जांच पर अविश्वास जताते हुए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग की थी क्योंकि राज्य की पुलिस प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चयनात्मक (selective) सबूत लीक कर रही थी, जिससे "मीडिया ट्रायल" की स्थिति पैदा हो रही थी और जिन लोगों के विरुद्ध गलत तरह से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है उन लोगों को भी मीडिया ट्रायल द्वारा अभियुक्त ठहराया जा रहा है इसी कारण से यह जांच का तरीका पक्षपाती लग रहा था, जिसका उद्देश्य केवल सरकार विरोधी आवाजों को दबाना था।
साक्ष्यों की प्रामाणिकता पर सवाल :- याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस जिन पत्रों और डिजिटल सबूतों (जैसे कथित तौर पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश वाले पत्र) का हवाला दे रही है, वे संदिग्ध हैं और उन्हें गढ़ा (fabricated) गया हो सकता है।
कोर्ट का फैसला क्या रहा ?
बहुमत के फैसले (3 जजों में से 2) में सुप्रीम कोर्ट ने SIT जांच की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि आरोपियों को यह चुनने का अधिकार नहीं है कि उनकी जांच कौन सी एजेंसी करेगी। हालांकि, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने एक असहमतिपूर्ण (Dissenting) निर्णय दिया, जिसमें उन्होंने याचिकाकर्ताओं के तर्कों से सहमति जताई और कहा कि पुलिस की कार्रवाई पक्षपाती प्रतीत होती है, इसलिए SIT जांच होनी चाहिए। "असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व है, अगर इसे काम करने की अनुमति नहीं दी गई, तो दबाव का बर्तन (pressure cooker) फट सकता है।" — जस्टिस चंद्रचूड़ का प्रसिद्ध उद्धरण था इतना ही नहीं उपरोक्त आदेश बहुत ही महत्वपूर्ण आदेश है भीमा कोरेगांव की हिंसा के मामले को लेकर लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक और याचिका जिसका नेचुरल साईटेशन JYOTI JAGTAP v NATIONAL INVESTIGATING AGENCY AND ANR|Crl.A. No. 2598/2023 and THE NATIONAL INVESTIGATION AGENCY v MAHESH SITARAM RAUT AND ANR.|Crl.A. No. 3048/2023 जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया। जगताप की ओर से सीनियर एडवोकेट अपर्णा भट्ट ने खंडपीठ को बताया कि वह पाँच साल से ज़्यादा समय से हिरासत में हैं। खंडपीठ अगली सुनवाई तक अंतरिम ज़मानत देने पर सहमत हो गई।
गौरतलब है कि इसी खंडपीठ ने हाल ही में सह-आरोपी महेश राउत को भी मेडिकल आधार पर 6 हफ़्ते की अंतरिम ज़मानत दी थी, जिसे बाद में 26 नवंबर तक बढ़ा दिया गया। वह जून 2018 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से हिरासत में हैं। राउत के मामले का ज़िक्र सीनियर एडवोकेट सी.यू. सिंह ने भी किया और अदालत ने उनकी अंतरिम ज़मानत सुनवाई के अगले दिन तक बढ़ा दी। जगताप और 16 अन्य लोगों पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने पुणे के भीमा कोरेगांव में हुई जातीय हिंसा के लिए ज़िम्मेदार होने का आरोप लगाया था।
पुणे पुलिस (बाद में NIA) ने तर्क दिया कि एल्गर परिषद – कोरेगांव भीमा युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम – में दिए गए भड़काऊ भाषणों के कारण महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव गाँव के पास मराठा और दलित समूहों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। इसके बाद हिंसा की कथित साजिश रचने और योजना बनाने के आरोप में 16 एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया गया। उन पर मुख्य रूप से उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से प्राप्त पत्रों और ईमेल के आधार पर UAPA के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए।
फरवरी 2022 में स्पेशल NIA कोर्ट ने जगताप की ज़मानत याचिका खारिज की, जिसे बाद में अक्टूबर में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा। उनकी अर्जी खारिज करते हुए हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने कहा कि कबीर कला मंच के नाटकों के संवाद, जिनमें 'राम मंदिर', 'गोमूत्र' और 'अच्छे दिन' जैसे शब्दों/वाक्यांशों का उपहास किया गया- जो लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार पर निशाना साधते थे - नफरत भड़काते हैं और एक बड़ी साजिश का संकेत देते हैं।
राउत को 21 सितंबर, 2023 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुण-दोष के आधार पर ज़मान दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने NIA को अपील दायर करने के लिए एक सप्ताह के लिए आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद NIA ने कोर्ट में अपील दायर की, जिसे जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की खंडपीठ ने स्वीकार कर लिया और हाईकोर्ट द्वारा दी गई एक सप्ताह की रोक को 5 अक्टूबर, 2023 तक बढ़ा दिया। तब से रोक को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है।
निष्कर्ष
भीमा कोरेगांव का संघर्ष 1818 से लेकर 2018 तक कुछ भी भारत में नहीं बदला आज भी दलित तथा आदिवासी की स्थिति भारत में वही बनी हुई है जो आज से सैकड़ो साल पहले थी यदि भारत का संविधान दलित तथा आदिवासी के हितों की रक्षा नहीं करता तो जो आज दलित तथा आदिवासी के अधिकार भारत में सुरक्षित हैं वह नहीं होते आज भी भारत के सभी राज्य अथवा केंद्र की सरकार के साथ-साथ न्यायालय भी नेचुरल जस्टिस की भावना नहीं है उदाहरण के तौर पर हमारे भारत में सती प्रथा नाम की एक कुप्रथा व्यवस्था थी जिसमें महिलाओं को पति की मृत्यु के उपरांत सती होना पड़ता था सती का अर्थ पवित्र स्त्री या सच्ची पत्नी होता था जिसमें महिला पति के साथ इस चिता पर जलने के लिए बाध्य किया जाता था लेकिन इस प्रथा का अंत राजा राममोहन राय द्वारा आंदोलन चलाए जाने के उपरांत लॉर्ड विलियम बेंट ने सती निषेध अधिनियम 1829 पारित किया अब प्रश्न यहां पर यह उठता है कि सिर्फ सती प्रथा का अंत ही क्यों करने के लिए राजा राममोहन राय आगे आए क्या राजा राममोहन राय सती प्रथा को अंत करने के बाद उन्होंने छुआछूत देवदासी प्रथा या अन्य वह सभी प्रथाएं जिम दलितों का उत्पीड़न किया जाता था इसके विरुद्ध राजा राममोहन राय ने क्यों आवाज नहीं उठाई उन्होंने सिर्फ आवाज सती प्रथा पर ही क्यों उठे क्योंकि श्री राजा राममोहन राय द्वारा यह समझ लिया गया था कि जो महिलाएं सती हो रही है वह उनके समाज की भी है इसलिए उन्हें बहुत ही गहरा दुख हुआ होगा और उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उन्हें ऐसा लगा कि हिंदू धर्म में सती प्रथा एक को प्रथा व्यवस्था है इसीलिए उन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध अपनी मुहिम चलाई और उसके विरुद्ध अधिनियम पारित करवाया ठीक इसी प्रकार से आज के समय में भी चल रहा है जहां पर स्वर्ण समाज को लगता है कि उनका नुकसान हो रहा है या उनके समाज का बहुत बड़ी हानि हो रही है वहां पर कानून भी शीघ्रता से पास हो जाता है यदि कानून में कोई गलती है तो न्यायालय उसे Suo Motu संज्ञान भारत के संविधान अनुच्छेद 32 तथा अनुच्छेद 131 और 142 के अंतर्गत न्यायालय ले लेते है "सो मोटो कॉग्निज़ेंस' क्या है? 'सो मोटो कॉग्निज़ेंस' का अर्थ है किसी भी औपचारिक याचिका या शिकायत के बिना, अदालत का स्वयं पहल करके किसी मामले पर संज्ञान लेना या सुनवाई करना" लेकिन जहां पर बात दलित उत्पीड़न दलित शोषण और दलितों के लिए नेचुरल जस्टिस का मामला हो वहां पर न सरकार कुछ करती है और ना ही न्यायालय कुछ करता है।
भीमा कोरेगांव वाले मामले में भी कुछ इसी प्रकार से हुआ इसको हम इस तरह से समझते हैं कि एक कार्यक्रम चल रहा था जिसमें कार्यक्रम करने वाले लोग बिना किसी व्यक्ति को और देश की शांति को नुकसान पहुंचाए बिना कार्यक्रम कर रहे थे और उसे कार्यक्रम में तत्कालीन सरकार का विरोध कर रहे थे तो क्या गलत कर रहे थे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही अपने आदेश में यह प्रतिपादित किया था कि Kedar Nath Singh vs State of Bihar, 1962 AIR 955. माननीय न्यायालय ने कहा कि सरकार के कार्यों की कड़ी से कड़ी आलोचना करना देशद्रोह नहीं है, जब तक कि वह हिंसा भड़काने या सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को बिगाड़ने के इरादे से न की गई हो। केवल सरकार के प्रति नापसंदगी व्यक्त करना अपराध नहीं है। तो भीमा कोरेगांव वाले मामले में सरकार का विरोध करना शांति सुरक्षा की बात कैसे आ गई। अब रही बात माओवादी संगठन या नक्सलीय संगठनों से संबंध की बात तो कार्यक्रम करने वाला व्यक्ति या नहीं जान सकता की उसे कार्यक्रम में आने वाला व्यक्ति किस संगठन से है या किसी संगठन से उसका किस संगठन से ताल्लुक है कोई कैसे जान सकता है। उदाहरण के तौर पर हम इस बात को इस प्रकार से मान लें कि हम एक कार्यक्रम कर रहे हैं और उसे कार्यक्रम में एक भीड़ आए अब वह भीड़ किस प्रकार की है, किस संगठन से संबंध रखती है ये जानकारी कार्यक्रम करने वाले व्यक्ति को कैसे हो सकती है पुलिस जांच में वह लोग दोषी बनाये गए जिनका संबंध किसी भी गलत संगठन से नहीं था। पुलिस ने जिन लोगों के विरुद्ध चार्ज शीट विचरण न्यायालय में दाखिल की वह लोग किसी भी प्रकार से ना माओवादी थे और ना नक्सलीय थे वह सिर्फ एक समाजसेवी थे जो दलितों तथा आदिवासियों के अधिकारों लिए की लड़ाई लड़ने का काम करते थे क्योंकि भीमा कोरेगांव की हिंसा में सिर्फ महाराष्ट्र के लोग अभियुक्त नहीं बनाए गए थे बल्कि अभियुक्त बनाए गए लोग महाराष्ट्र के बाहर दिल्ली व अन्य राज्यों के लोगों के नाम पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट में शामिल किया था पुलिस ने पूरी जांच को भीमा कोरेगांव कार्यक्रम के समर्थकों के विरुद्ध ही अपनी जांच करने का मन बना लिया था और अपनी गलत जांच के उपरांत पुलिस ने उन निर्दोष लोगों को जेल भेजा था यह एकदम सच्चाई है कि सदैव से भारत में सत्ता का दुरुपयोग करना कोई खास बात नहीं है चाहे केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही हो या वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो या किसी भी राज्य में इन दोनों राजनीतिक दलों की सरकारों ने सदैव दलित व आदिवासी उत्पीड़न का कार्य अपने शासनकाल में हमेशा किया है और दलित तथा आदिवासीयों की आवाज तथा अधिकारों का हनन किया है।
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
एडवोकेट हाई कोर्ट इलाहाबाद
मो०9532112005
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