महाड सत्याग्रह सामाजिक समानता और मानव अधिकारों की ऐतिहासिक क्रांति तथाडॉ आंबेडकर के विरुद्ध दर्ज हुए मुकदमे
भारत का सामाजिक इतिहास केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समानता के लिए किए गए आंदोलनों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। भारतीय समाज में सदियों तक चली जाति-व्यवस्था और छुआछूत ने समाज के एक बड़े वर्ग (1931 की जनगणना के अनुसार भारत में अछूतों की संख्या लगभग 35 करोड़ के आसपास रही होगी) को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा। इन्हीं अन्यायपूर्ण परिस्थितियों के विरुद्ध जो आंदोलन हुए, उनमें महाड सत्याग्रह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आंदोलन माना जाता है। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल में भारतीय समाज गहरे सामाजिक भेदभाव से ग्रस्त था। दलित या तथाकथित “अस्पृश्य” वर्ग को समाज के निम्नतम स्तर पर रखा जाता था। उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता था, सार्वजनिक कुओं और तालाबों से पानी लेने की अनुमति नहीं थी, और कई स्थानों पर उन्हें सड़क पर भी अलग चलना पड़ता था। यह स्थिति मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध थी। यह सत्याग्रह केवल पानी पीने के अधिकार का संघर्ष नहीं था, बल्कि मानव गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रतीक बन गया। इस आंदोलन का नेतृत्व महान समाज सुधारक और भारतीय संविधान व हिंदू कोड बिल के निर्माता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने किया क्योंकि बाबा साहब डॉ. आंबेडकर का मानना था कि जब तक दलितों को सामाजिक समानता नहीं मिलेगी, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं होगा। इसी विचारधारा से महाड सत्याग्रह की शुरुआत हुई।
महाड सत्याग्रह का आयोजन स्थल का संक्षिप्त परिचय
महाड सत्याग्रह महाराष्ट्र राज्य के महाड नगर में आयोजित किया गया था, जो वर्तमान में रायगढ़ जिला के अंतर्गत आता है। यह आंदोलन विशेष रूप से महाड नगर के प्रसिद्ध चावदार तालाब पर हुआ था। उस समय यह तालाब नगरपालिका द्वारा सार्वजनिक घोषित किया गया था, लेकिन सामाजिक भेदभाव के कारण दलित समुदाय को वहाँ से पानी लेने की अनुमति व्यवहारिक रूप से नहीं दी जाती थी। इसी अन्याय के विरोध में हजारों दलित लोग एकत्र हुए और बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में करोड़ों लोगों ने इस आंदोलन में भाग लेते हुए चवादार तालाब से पानी लेकर अपने समान नागरिक अधिकारों की घोषणा की महाड सत्याग्रह जिसे चवादार तालाब सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है। महाड स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण बना क्योंकि यहाँ पहली बार संगठित रूप से सार्वजनिक संसाधनों पर समान अधिकार की मांग को व्यवहार में लागू किया गया, जिसने भारतीय समाज में सामाजिक समानता और मानव गरिमा के संघर्ष को नई दिशा प्रदान की।
महाड सत्याग्रह का आयोजन
19-20 मार्च 1927 को हजारों दलित और सामाजिक कार्यकर्ता महाड में एकत्र हुए। यह केवल एक सभा नहीं थी, बल्कि आत्मसम्मान और अधिकारों की घोषणा थी। डॉ. आंबेडकर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि अधिकार भीख में नहीं मिलते, बल्कि संघर्ष से प्राप्त किए जाते हैं तथा सभा के लोगो ने बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में लोगों का समूह चवदार तालाब की ओर बढ़ा। वहाँ पहुँचकर उन्होंने सार्वजनिक जलस्रोत से पानी पिया। यह घटना प्रतीकात्मक होते हुए भी अत्यंत क्रांतिकारी थी, क्योंकि पहली बार दलितों ने खुले रूप से अपने नागरिक अधिकार का प्रयोग किया। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने अपने भाषण में सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि महाड में एकत्रित होना किसी के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए नहीं, बल्कि अपने मानवीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए है। उन्होंने कहा कि पानी पीना केवल एक साधारण आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह समान नागरिक होने का प्रतीक है। यदि किसी समाज को सार्वजनिक जलस्रोत से पानी लेने का अधिकार नहीं है, तो इसका अर्थ है कि उसे मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा।
यह कदम सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने जैसा था। इससे दलित समाज में आत्मविश्वास और जागरूकता की नई लहर पैदा हुई।
सत्याग्रह के मुख्य उद्देश्य
सार्वजनिक संसाधनों पर समान अधिकार स्थापित करना।
अस्पृश्यता प्रथा का विरोध करना।
दलित समाज में आत्मसम्मान और जागरूकता पैदा करना।
संपूर्ण भारत को तथा छुआछूत मानने वाले सवर्ण और गैर सवर्ण समाज को यह संदेश देना कि सभी मनुष्य समान हैं।
सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना की दिशा में कदम बढ़ाना।
बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर का उद्देश्य केवल पानी प्राप्त करना नहीं था, बल्कि समाज की मानसिकता बदलना था।
विरोध और संघर्ष
जब बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में हजारों दलित 20 मार्च 1927 को महाड पहुँचे और सभा के बाद चवदार तालाब की ओर गए। उन्होंने शांतिपूर्वक तालाब से पानी पिया, जो उनके नागरिक अधिकार का प्रतीकात्मक प्रयोग था। इस घटना की खबर फैलते ही स्थानीय रूढ़िवादी उच्च जाति समूहों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। तालाब से पानी पीने के बाद जब सत्याग्रह में शामिल लोग वापस लौट रहे थे, तब कुछ कट्टरपंथी लोगों ने उन पर हमला किया। कई दलितों को रास्ते में घेरकर मारपीट की गई। लाठियों और पत्थरों से हमला करने की घटनाएँ दर्ज हुईं। अनेक लोगों को चोटें आईं और उन्हें अपमानित करने की कोशिश की गई। यह हिंसा अचानक भीड़ द्वारा की गई प्रतिक्रिया थी, न कि आंदोलनकारियों की ओर से। इसके बाद एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। उच्च जाति के कुछ लोगों ने यह दावा किया कि तालाब “अपवित्र” हो गया है। इसके परिणामस्वरूप तालाब को “शुद्ध” करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान कराए गए। यह कार्य स्वयं में प्रतीकात्मक सामाजिक हिंसा माना जाता है, क्योंकि इसका उद्देश्य दलितों को पुनः सामाजिक रूप से नीचा दिखाना था। कुछ स्थानों पर दलितों के घरों और बस्तियों में डर और तनाव का वातावरण पैदा किया गया। सत्याग्रह में भाग लेने वालों को धमकियाँ दी गईं ताकि वे भविष्य में सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करने का प्रयास न करें। सामाजिक बहिष्कार और दबाव भी हिंसा का एक रूप बन गया। इन घटनाओं के बाद स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए। मारपीट और अशांति से जुड़े मामलों ने बाद में अदालतों तक पहुँचकर वही प्रसिद्ध कानूनी मुकदमा उत्पन्न किया जिसमें तालाब के उपयोग के अधिकार पर न्यायालय ने निर्णय दिया।
इस आंदोलन के बाद मनु व्यवस्था को बरकरार रखने वाले जातिवादी मानसिकता के लोगों ने बाबा साहब डॉ अंबेडकर के विरुद्ध सिविल मुकदमा किया जिसका मुकदमा सं 405 सन 1927 दिनांक 12 दिसंबर 1927 को दाखिल किया गया था इसमें निचली अदालत अस्थाई निषेधाज्ञा बाबा साहेब डॉ आंबेडकर व सभी आंदोलनकारी के विरुद्ध था जिसमें निचली अदालत ने अपने आदेश में कहा कि "चौदार तालाब केवल स्पृश्य वर्गों की निजी संपत्ति है और अछूत वर्गों को उस तालाब पर जाने तथा उससे पानी लेने का अधिकार नहीं है। यह इस स्थायी निषेधाज्ञा को प्राप्त करने के संबंध में भी था कि प्रतिवादियों को इनमें से कोई भी कार्य करने से रोका जाए। आवेदक इस आवेदन-पत्र के द्वारा प्रार्थना करते हैं कि मुकदमे के निपटारे तक प्रतिवादियों के विरुद्ध एक अस्थायी निषेधाज्ञा जारी की जाए। आवेदन-पत्र में अन्य बातों के साथ-साथ यह कहा गया है कि सैकड़ों वर्षों से यह तालाब केवल स्पृश्य वर्गों के उपयोग के लिए रहा है, कि 19 मार्च, 1927 को प्रतिवादी के नेतृत्व में अछूत वर्गों के बहुत से लोगों ने अचानक तालाब में प्रवेश किया, उन्होंने अपने हाथ और मुंह पानी से धोये और इस प्रकार इसको दूषित कर दिया कि इस संदूषण के कारण स्पृश्य वर्ग 24/25 घंटों तक अर्थात् जब तक कि पानी को बड़ी लागत पर, हिन्दू शास्त्रों में निर्धारित विधि-विधानों को पूरा करके शुद्ध नहीं किया गया, तालाब से पानी नहीं ले सके कि इस प्रकार स्पृश्य वर्गों को बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, कि अछूत वर्गों ने एक घोषणा-पत्र जारी किया है जिसमें उन्होंने तालाब में पुनः प्रवेश करने और उससे पानी लेने के अपने इरादे की घोषणा की है, कि यदि उनको ऐसा करने दिया जाता है. तो स्पृश्य वर्ग शास्त्रों के अनुसार तालाब के पानी का उपयोग नहीं कर पाएंगे, कि इसके परिणामस्वरूप गंभीर कठिनाई हो जाएगी और यदि मांगी गई अस्थायी निषेधाज्ञा मंजूर नहीं की जाती है और प्रतिवादियों को यादियों के पानी को दूषित करने दिया जाता है तो चाहे वादी अन्ततः मुकदमा जीत जाएं, तो भी उन्हें डिक्री का लाभ नहीं मिलेगा।
आवेदन-पत्र, वादी संख्या 1 के अतिरिक्त अनेक व्यक्तियों के शपथ-पत्रों द्वारा समर्थित है। वादियों ने प्रदर्श 4 के साथ एक नोटिस भी प्रस्तुत किया है जिसे नगरपालिका द्वारा एक दिवाकर जोशी (शपथ पत्र देने वाले व्यक्तियों में से एक व्यक्ति) के विरुद्ध जारी किया गया था जिसमें उससे कहा गया था कि वह चौदार तालाब से सटे हुए पत्थर के धक्कास (बांधों) की मरम्मत करे, और धरप परिवार के विभाजन का विलेख जो कथित रूप से एक सौ साल से भी अधिक पुराना है. भी प्रस्तुत किया। इस विलेख में विभाजित की गई संपत्ति के रूप में तालाब के पाल का उल्लेख है। ये दोनों दस्तावेज तालाब के निजी संपत्ति होने की प्रथम दृष्टया उपधारणा पैदा करते है।
अब प्रश्न यह है कि क्या इसको मना करने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा मंजूर करना अधिक ठीक होगा। अस्थायी निषेधाज्ञा संबंधी विधि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 में अंतर्विष्ट है। इस आदेश का नियम इस प्रकार है जहाँ किसी मुकदमे में शपथपत्र द्वारा या अन्यथा यह साबित हो जाता है (क) कि मुकदमे में विवादाग्रस्त किसी संपत्ति को मुकदमे में किसी पक्ष द्वारा बर्बाद किए जाने, क्षतिग्रस्त किए जाने या हस्तांतरित किए जाने का खतरा हो, अथवा किसी डिक्री के निष्पादन में उसे सदोषतया कहा गया हो या (ख) कि प्रतिवादी अपने ऋणदाताओं के साथ धोखा करने की दृष्टि से अपनी संपत्ति को हटाने अथवा बेचने की धमकी देता हो या इरादा रखता हो, तो न्यायालय, आदेश द्वारा, अस्थायी ब्यादेश दे सकता है। खंड (ख) स्पष्टतः वर्तमान मामले में लागू नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान मामला खंड (क) में आता है।
यह एक ऐसा तालाब है जो वर्षों से स्पृश्य वर्गों के विशिष्ट उपयोग में रहा है। प्रतिवादी 1 और अन्य लोगों के हस्ताक्षरों सहित जारी किया गया घोषणापत्र भी यह दिखाता है कि अछूत वर्गों का अब तक यह विचार था कि उनको तालाब में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। इस प्रकार इससे ऐसा प्रतीत होता है कि तालाब अब तक स्पृश्य वर्गों के विशिष्ट उपयोग में रहा है। अब प्रश्न यह है कि क्या न्याय का उद्देश्य पुरानी स्थिति में हस्तक्षेप करके अथवा इसे पक्षों के अधिकारों पर अंतिम निर्णय होने तक चलते रहने देकर अधिक अच्छे ढंग से प्राप्त किया जा सकता है।
अस्थायी निषेधाज्ञाओं पर लागू सिद्धांतों का सारांश, सिविल प्रक्रिया संहिता पर मुल्ला की टीका 8वां संस्करण में पृष्ठ 892 पर दिया गया है। उनमें से एक सिद्धांत यह है कि न्यायालय को यह देखना चाहिए कि पक्षों के बीच वास्तविक विवाद है। मुझे प्रतीत होता है कि इसके बारे में बहुत कम संदेह है। दूसरा सिद्धांत यह है कि "यदि निषेधाज्ञा जारी नहीं की जाती है, तो सफलता की दशा में, अधिक असुविधा किस पक्ष को होगी। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि निषेधाज्ञा जारी नहीं की जाती है, तो अधिक असुविधा वादियों को होगी। यह बात इतनी स्पष्ट है कि मैं नहीं समडाता कि मुझे इस पर कुछ भी मेहनत करने की आवश्यकता है।
यदि प्रतिवादियों को तालाब में प्रवेश करने दिया जाता है और इस प्रकार (वादियों की धार्मिक धारण के अनुसार) पानी को दूषित करके उसे आगे उपयोग के लिए अनुपयुक्त कर दिया जाता है तो एक बड़ी आबादी को कठिनाई और असुविधा होगी जो इतनी गंभीर होगी कि केवल ऐसे स्थानों में रहने वाले लोग ही उसे समझ सकते हैं, जहां कि पानी की प्रचुर आपूर्ति नहीं होती। दूसरी तरफ, यदि प्रतिवादियों से कहा जाए कि मुकदमे के पहले विनिश्चय तक, वे जिसे अपना अधिकार समझते हैं. उसका प्रयोग न करें, तो उनको किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी। यह रास्ता मुझे न केवल उचित और न्यायसंगत प्रतीत होता है बल्कि यथापूर्व स्थिति बनाए रखने के लिए जो कि अनिवार्य है. इन परिस्थितियों में एकमात्र सही रास्ता भी है। आई.एल.आर. 46 कलकत्ता, पृष्ठ 1030 पर अंकित टिप्पणी द्वारा आवेदकों (वादियों) द्वारा यह भी दलील दी गई कि यदि जैसे कि मांग की गई है, अस्थायी निषेधाज्ञा मंजूर नहीं की जाती है और तालाब के पानी को दूषित करने दिया जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप वादियों की अपूरणीय क्षति होगी। इस पर विचार करते हुए कि इस विषय पर स्पृश्य वर्ग सामान्यतः कितने संवेदनशील हैं, जिसका कारण उनकी धार्मिक भावनाएं तथा दोनों समुदायों के बीच प्राचीन काल से चला आ रहा अंतर है, मैं इस शर्त को बहुत महत्व देने के लिए प्रवृत्त हूं। मुझे कोई संदेह नहीं है कि शिक्षा का प्रसार यथा समय, इन दशाओं को महत्वपूर्ण तरीके से बदल देगा और दोनों समुदायों को एक दूसरे के साथ स्पष्ट तथा मैत्रीपूर्ण संपर्क में लाएगा और अस्पृश्यता विगत की बात हो जाएगी। परंतु जैसी वर्तमान स्थिति है, मैं अवश्य ही आवेदकों की इस भावना को अधिक महत्व दूंगा कि यदि पानी को दूषित करने दिया जाता है, तो उससे जो क्षति जारी रहेगी, वह ऐसा होगी कि उसकी पर्याप्त क्षतिपूर्ति नहीं हो सकेगी।
इस सब परिस्थितियों पर विचार करते हुए, मैं समझता हूं कि यदि मैं उस निषेधाज्ञा को, जिसकी प्रार्थना की गई है, अस्वीकार नहीं करता हूं तो मैं अपने कर्त्तव्य पालन में असफल रहूँगा। जिस कर्तव्य का पालन करने के लिए मुझे कहा गया है, वह बहुत दुःखदायी है, किन्तु कर्त्तव्य के आगे पसंद की कोई गुंजाइश नहीं होती। अतः मैं आदेश देता हूं कि एक अस्थायी निषेधाज्ञा जैसे कि मांग की गई है. नोटिस के साथ जारी की जाए।
(हस्ताक्षर) जी. वी. वैद्य"
इस आदेश के बाद सत्याग्रह आंदोलन को समाप्त करने के सिवा बाबा साहेब डॉ अंबेडकर के पास कोई और रास्ता नहीं था और इस सिविल मुकदमे की अगली सुनवाई 23 फरवरी 1928 को थी बाबा साहेब डॉ अंबेडकर इस मुकदमे में खुद अधिवक्ता के तौर पर मुकदमे की पैरवी की इस मुकदमे की अगली सुनवाई को बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने विलक्षण बहस से न केवल निषेधाज्ञा रद्द कराई बल्कि न्यायाधीश को सार्वजनिक तालाब के प्रयोग के उनके अधिकार को सहभागिता से भी अस्वस्थ किया तब मजिस्ट्रेट ने अपने निषेधाज्ञा को रद्द कर दिया " इस आदेश के विरुद्ध में जिला न्यायालय थाना में सवर्ण विपक्षीगणों ने अपील दाखिल हुई जिसे उपन्यादिश वर सर्राफ ने दिनांक 8 जून 1931 को यह आदेश दिया कि अपील करता सवर्ण हिंदू तालाब को अपने स्वामित्व को सिद्ध नहीं कर सके किस प्रकार सार्वजनिक तथा अछूतों के लिए खुला घोषित किया गया। इसके बाद सवर्ण हिंदू 8 जून 1931 के इस आदेश के विरुद्ध जिला न्यायालय में अपील की जिसे द्वितीय सहायक न्यायाधीश एस एम कोकनी द्वारा सवर्ण हिंदुओं के इस अपील को खारिज कर दिया और पिछले आदेश को बहाल करते हुए दिनांक 17 मार्च 1937 विरोधियों के द्वारा दाखिल अपील को खारिज कर दिया इन सभी मुकदमो में अधिवक्ता के तौर पर बाबा साहेब डॉ अंबेडकर ने पैरवी की थी विपक्षी सवर्ण हिंदू सभी जगह से मुकदमे हार गए और डॉ अंबेडकर मुकदमा जीत गए तब विरोधियों ने उसे जीते हुए आदेश को बाम्बे उच्च न्यायालय में दाखिल किया जिसका साईटेशन
Narhari Damodar Vaidya v. Bhimrao Ramji Ambedkar (1937) 39 Bombay Law Reporter 1295 तथा उसे समय के तत्कालीन बाम्बे उच्च न्यायालय न्यायाधीश (Before Broomfield J. and N. J. Wadia J.) Decision dated: 17 March 1937 Second Appeal No. 462 of 1933(arising out of Suit No. 405 of 1927) जिसमें महाड नगर के प्रसिद्ध चौधरी तालाब के उपयोग के अधिकार को लेकर उच्च जाति हिंदुओं और तथाकथित अछूत समुदाय के बीच उत्पन्न विवाद का कानूनी परीक्षण किया गया। यह मामला केवल संपत्ति या जलस्रोत के उपयोग का साधारण विवाद नहीं था, बल्कि उस समय के भारतीय समाज में प्रचलित छुआछूत, सामाजिक भेदभाव और नागरिक अधिकारों से जुड़े गहरे प्रश्नों को सामने लाता है। इस मुकदमे में एक ओर वे लोग थे जो स्वयं को परंपरा और प्राचीन प्रथा के आधार पर तालाब के विशिष्ट उपयोग का अधिकारी मानते थे, जबकि दूसरी ओर वे लोग थे जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक व्यवस्था के कारण सार्वजनिक संसाधनों से दूर रखा गया था और जो समान अधिकार की मांग कर रहे थे। इस प्रकार यह न्यायिक प्रकरण सामाजिक परिवर्तन और विधिक सिद्धांतों के टकराव का प्रतिनिधित्व करता है।
महाड, जो तत्कालीन कोलाबा जिले का एक नगर था, वहाँ स्थित चौधरी तालाब नगर के बाहरी क्षेत्र में एक बड़ा सार्वजनिक जलस्रोत था। तालाब के आसपास मुख्यतः उच्च जाति हिंदुओं के मकान स्थित थे और वे लंबे समय से इसका उपयोग करते आ रहे थे। नगर की कुल जनसंख्या सात से आठ हजार के बीच थी, जिसमें लगभग चार सौ लोग अछूत समुदाय से संबंधित थे। ऐतिहासिक रूप से यह माना जाता था कि अछूतों ने तालाब का उपयोग नहीं किया, हालांकि यह स्थिति किसी लिखित कानून के कारण नहीं बल्कि सामाजिक परंपराओं और छुआछूत की मान्यताओं के कारण बनी हुई थी। समय के साथ जब सामाजिक जागरूकता बढ़ी और समान अधिकारों की मांग उठी, तब अछूत समुदाय ने भी तालाब के उपयोग का दावा किया, जिससे विवाद उत्पन्न हुआ।
1927 में उच्च जाति हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वादियों ने अदालत में मुकदमा दायर किया और यह घोषणा माँगी कि तालाब के पानी का उपयोग केवल उन्हें करने का अधिकार है तथा अछूतों को इसके उपयोग से रोका जाए। उन्होंने अपने दावे का आधार एक कथित प्राचीन प्रथा को बताया, जिसके अनुसार तालाब का उपयोग केवल उच्च जाति के लोगों द्वारा किया जाता रहा था। दूसरी ओर प्रतिवादियों ने यह तर्क दिया कि तालाब सार्वजनिक संपत्ति है और नगरपालिका के अधिकार में आता है, इसलिए किसी भी नागरिक को उससे वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि मुसलमान और ईसाई तालाब का उपयोग कर सकते हैं, तो हिंदू समाज का हिस्सा होने के कारण उन्हें भी इसका अधिकार होना चाहिए। साथ ही उन्होंने छुआछूत की प्रथा को न्याय, नैतिकता और सार्वजनिक हित के विरुद्ध बताया।
निचली अदालत ने साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद पाया कि वादी यह सिद्ध नहीं कर सके कि अछूतों को बाहर रखने की कोई ऐसी प्राचीन और कानूनी रूप से मान्य प्रथा अस्तित्व में थी, जो उन्हें विशेष अधिकार प्रदान करती हो। अदालत ने माना कि केवल इस तथ्य से कि एक वर्ग लंबे समय तक किसी संसाधन का उपयोग करता रहा और दूसरा वर्ग नहीं करता रहा, यह सिद्ध नहीं होता कि पहला वर्ग कानूनी रूप से विशिष्ट अधिकार प्राप्त कर लेता है। परिणामस्वरूप वाद खारिज कर दिया गया। इस निर्णय के विरुद्ध अपील की गई, लेकिन सहायक न्यायाधीश ने भी यही माना कि ऐसा कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि अछूतों का बहिष्कार अनादि काल से चला आ रहा था या हिंदू कानून में इसका स्पष्ट समर्थन मिलता है।
मामला अंततः बाम्बे उच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ न्यायमूर्ति ब्रूमफील्ड और न्यायमूर्ति वाडिया ने इस विवाद की विस्तार से सुनवाई की। न्यायालय के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या केवल सामाजिक प्रथा के आधार पर किसी सार्वजनिक जलस्रोत के उपयोग का विशिष्ट अधिकार स्थापित किया जा सकता है। न्यायालय ने माना कि प्राचीन प्रथा सिद्ध करने के लिए केवल जीवित लोगों की स्मृति तक सीमित साक्ष्य पर्याप्त नहीं होता, जब तक यह न दिखाया जाए कि परिस्थितियाँ लंबे समय तक स्थिर और अपरिवर्तित रही हों। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी प्रथा को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है जब उसका अस्तित्व बहुत लंबे समय से लगातार और स्पष्ट रूप से सिद्ध हो। साक्ष्यों से यह अवश्य सिद्ध हुआ कि लंबे समय तक तालाब का उपयोग उच्च जाति हिंदुओं द्वारा किया जाता रहा और अछूतों ने उसका उपयोग नहीं किया था, लेकिन न्यायालय ने यह माना कि यह स्थिति सामाजिक मान्यताओं और छुआछूत की स्वीकृति के कारण थी, न कि किसी कानूनी अधिकार के कारण। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि तालाब का उपयोग मुसलमान भी करते थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उपयोग पर पूर्ण धार्मिक या सामाजिक प्रतिबंध नहीं था। इसलिए यह दावा कि तालाब केवल एक विशेष वर्ग के लिए आरक्षित था, न्यायालय को स्वीकार्य नहीं लगा।
न्यायालय ने यह भी विचार किया कि किसी सार्वजनिक संसाधन पर विशिष्ट अधिकार का दावा तभी मान्य हो सकता है जब उसके समर्थन में ठोस ऐतिहासिक और कानूनी प्रमाण हों। केवल परंपरा या सामाजिक व्यवहार के आधार पर किसी अन्य वर्ग को स्थायी रूप से बाहर नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि वादी अनादि प्रथा सिद्ध करने में असफल रहे हैं और इसलिए उनका दावा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। परिणामस्वरूप अपील को लागत सहित खारिज कर दिया गया।
(नोट- इसे अपने भाषा में अनुवाद करने की कोशिश की गई है आदेश का पूरी तरह से अनुवाद नहीं है नीचे दिए गए आदेश अंग्रेजी में पढ़ सकते हैं।)
VOL. XXXIX.] THE BOMBAY LAW REPORTER. 1295
1937
March 17.
Before Mr. Justice Broomfield and Mr. Justice N. J. Wadia.
NARHARI DAMODAR VAIDYA
V.
BHIMRAO RAMJI AMBEDKAR.*
Custom—Evidence as to immemorial custom—Proof of existence of custom during living memory—Presumption as to immemorialty—Conditions requisite for.
To establish the right of exclusive user of a public tank by immemorial custom it is not always necessary to produce evidence going back beyond the memory of living persons; nor is it necessary to have evidence of positive acts of exclusion of one party by the other.
A custom proved to have existed during the period of living memory can only be presumed to have existed from before the period of legal memory in cases where conditions may be assumed to have been permanent and stable, so that it is reasonable to infer that what has happened during the period covered by the evidence has also happened from time immemorial.
Mariappa v. Vaithilinga, followed.
Anandrao Bhikaji Phadke v. Shankar Daji Charya and Sankaralinga Nadan v. Rajeswara Dorai, distinguished.
SUIT for declaration and injunction.
In the town of Mahad in the Colaba district there was a public tank named the Chaudhari tank, admeasuring five hundred and forty feet by three hundred and forty feet. It lay on the outskirts of the town. The banks of the tank were occupied mostly by high caste Hindus, who constituted a large majority of the population. The defendants represented the untouchables of the place, who numbered about four hundred out of a total population of seven or eight thousand.
The tank was in use by the high caste Hindus as well as by Mahomedans. The untouchables never used the tank so far as human recollection went. Latterly, however, they insisted on using the water of the tank.
Narhari and others (plaintiffs), who represented the high caste Hindus of Mahad, sued, on December 12, 1927, for a declaration that they alone had the right to use the water of the tank and for an injunction to restrain the defendants from using it.
The defendants contended inter alia that the tank vested in the Municipality of Mahad and was open to the user by the defendants, that if the Mahomedans and Christians of the place could use the water, they (defendants) had a better right to it being within the fold of Hinduism, and that the custom of untouchability was against justice and conscience and was detrimental to public interest.
The trial Court held that the plaintiffs failed to prove that there was a long-standing custom of using the tank-water to the exclusion of the untouchables
* Second Appeal No. 462 of 1933, from the decision of S. M. Kaikini, Second Assistant Judge at Thana, in Appeal No. 32 of 1931, confirming the decree passed by V. R. Saraf, Subordinate Judge at Mahad, in Civil Suit No. 405 of 1927.
¹ [1913] M. W. N. 247, s. c. 18 I. C. 979.
² (1883) I. L. R. 7 Bom. 323.
³ (1908) I. L. R. 31 Mad. 236, s. c. 10 Bom. L.R. 781, P. C.
and that the custom was not recognisable as a legal right. The suit was, therefore, dismissed.
On appeal, the decree was affirmed by the Assistant Judge for the following reasons:
"Assuming for the sake of argument that the tank was constructed by Hindu rulers and that principles of Hindu law govern this case, still no text has been pointed out to show that under that law an untouchable should be held to have been excluded from the use of this tank... Great support to this, that in the case of big tanks there is no restriction on the ground of untouchability, is afforded by Mariappa Nadan v. Vaithilinga Mudaliar, 18 I. C. 979... In the face of such high authority and with the absence of any evidence to show that any custom exists anywhere in this Presidency excluding the untouchables from the use of any large public tank, or evidence clearly showing that even as regards this tank untouchables have been excluded from time immemorial, the finding on the second issue must be in the negative. There is nowhere any evidence produced to show that this exclusion of untouchables dates back from, say, pre-British days. All witnesses, the oldest of them is of sixty-five years, speak of their personal knowledge of the present exclusion of the untouchables. No person speaks of anything indicating that this exclusion dated from the days of the Maratha rule or the Mussalman rule."
The plaintiffs appealed to the High Court.
V. B. Virkar, for the appellants.
S. V. Gupte, with B. G. Modak, for respondent No. 1.
BROOMFIELD J
The appellants, on behalf of the caste Hindus of the town, of Mahad, sued the respondents, who represent the so-called " untouchables," for a declaration that the Choudhari Tank near the town belongs to them, and that they alone have a right to use it and the respondents are not entitled to use it, and for an injunction against the respondents not to use it. The claim to ownership is not now persisted in and it is conceded that, as found by the trial Court, the tank belonged to Government under the provisions of Section 37 of the Bombay Land Revenue Code and has now vested in the Municipality of Mahad under Section 50 of the District Municipalities Act. It is also conceded now that the caste Hindus are not entitled to exclusive user of the tank as against all the world, since Mahomedans may and do use it. It is contended nevertheless that the appellants have the right to use it themselves and to exclude the "untouchables" from the use of it, and this, right is said to be based on immemorial custom.
The Trial Judge found that the plaintiffs have proved a long-standing custom (he does not describe it as immemorial) of using the tank-water to the exclusion of the "untouchables." He held, however, that the custom conferred no legal right upon the plaintiffs because " mere user of a public tank by one class and non user by another would not clothe the class making the user with any legal rights or rights of ownership." On appeal the Assistant Judge confirmed the finding that the caste Hindus have not proved that they have any legal right to exclude the " untouchables." He has relied to some extent on a judgment of Sir Sadashiva Ayyar in Mcniappa v. Vaithilinga [1913] M.W.N. 247, s.c. 18 I.C. 979. (a case not reported apparently in the authorised reports); but his main reason seems to be that he held that the custom is not shown to be immemorial.
The Chaudhari tank is a small lake or large pool, between four and five acres in extent, on the outskirts of the town. It is surrounded on all sides by municipal roads beyond which are houses occupied by caste Hindus (and a very few Mahomedans), and the owners of these houses also own in many cases strips of land on the edge of the tank, ghats or flights of steps to get to the water and the masonry embankments along the sides. There are no houses of "untouchables" anywhere near. It is not known how old the tank is, except that it is admittedly not less than two hundred and fifty years old. There is no evidence as to its origin. It is not even clear that it is artificial. The trial Judge took the view that it was " a natural excavation in the bed of the earth, of course repaired and remodelled by human agency." If this is soand the point was not disputed in the argument before usit is probably many centuries old. The water-supply comes from the monsoon and a few natural springs. The population of the town of Mahad is between seven and eight thousand, of whom less than four hundred are "untouchables." The Municipality was established in 1865, but there is no evidence available, at any rate on the record of this case, as to the early history of the town or as to the time when the site was first inhabited.
The plaintiffs have examined a number of witnesses, many of them old inhabitants, whose evidence may be said to have established that within the period of living memory the tank has been used exclusively by the caste Hindus (and a few Mahomedans) and has never been used by the "untouchables." It is in fact admitted that the latter never used it before the year 1927, when a campaign against the doctrine of "untouchability" was carried on by defendant No. 1, and some of the "untouchables" went and drank the water as a protest. They were assaulted and beaten by the caste Hindus and there were criminal prosecutions which led to the present suit. As there is no record of any attempt having been made by the "untouchables" to use the tank before that, there is no evidence of any positive acts of exclusion. What is proved is user by the one party and absence of user by the other. This was due, no doubt, not to any accidental causes, but to the mutual acceptance of the doctrine of "untouchability" which until recent years was not openly challenged.
The learned Assistant Judge comments on the fact that there is no evidence of the exclusion of the "untouchables" in pre-British times, nothing to show that the exclusion or exclusive user was in force in the days of the Maratha rule or the Mussalman rule. It is of course not always necessary to produce evidence going back beyond the memory of living persons. On proof of enjoyment for a period even less than that the Courts have frequently felt justified in holding, in the absence of evidence to the contrary, that a custom has existed from time immemorial. Nor, of course, is it necessary in a case of this kind to have evidence of positive acts of exclusion of one party by the other. There could be no such evidence as long as the enjoyment of the caste Hindus was not challenged, and it would not be likely to be challenged as long as the doctrine of "untouchability" prevailed' and was accepted. But a custom proved to have existed during the period of living memory can only be presumed to have existed from before the period of legal memory in cases where conditions may be assumed to have been permanent and stable, so that R. 163 it is reasonable to infer that what has happened during the period covered by the evidence has also happened from time immemorial. This is where the plaintiffs' case in our opinion breaks down. As long as conditions were at all similar, as long as the houses of the caste Hindus have surrounded the tank (which is not necessarily very long as the tank is on the outskirts of the town and the land round it would not be likely to be occupied until after considerable expansion of the original settlement) it may be safely presumed that the practice was the same as at present. It would not: be safe to presume, however, that conditions have been similar for a period long enough to establish the alleged custom. The Konkan has had a chequered history, even in comparatively modern times, and to suppose that the caste Hindus, have been in a position to exercise exclusive control over this large natural reservoir, situated as it is, from time immemorial would be contrary to reasonable probability.
In this connection some of the observations of Sir Sadashiva Ayyar in Mariappa v. Vaithilinga are very instructive. He cites a saying of Manu's; "waters are pure as long as a cow goes to quench her thirst in them... and they have a good scent, colour and taste "and he points out that the Shastraic writings" make a distinction between rivers, tanks and other) receptacles into whose beds cows could get down to quench their thirst, and smaller receptacles which are more easily contaminated and where purification by time, atmospheric conditions and movement of the water is much more difficult. "The learned Judge suggests that the dictates of the Hindu religion would not. require any elaborate precautions against the pollution of water in a large open tank, and he was dealing with a tank in a village site, considerably smaller than the Choudhari tank at Mahad. The doctrine of "untouchability" therefore does not appear to go far enough to lend very much, support to the appellants' case, and it is doubtful whether any attempt would be made to secure exclusive user of the water until such time as the tank came to be surrounded by the houses of the caste Hindus.
This is the only case to which our attention has been drawn dealing with a claim to exclude "untouchables" from the use of a watering-place of this description. The temple-entry cases, e.g., Anandrav Bhikaji Phadke v. Shankar Daji Charya (1883) I.L.R. 7 Bom. 323, and Sankaralinga Nadan v. Rajeswara Dorai (1908) I.L.R. 31 Mad. 236, s.c. 10 Bom. L.R. 781.p.c, are not really on all fours. In such cases long practice acquiesced in by the other castes and communities may naturally give rise to a presumption of dedication to the exclusive use of the higher castes, and may throw upon the "untouchables" the burden of proving that they are among the people for whose worship a particular temple exists. No such presumption of a lawful origin' of the custom can be said to arise here.
We therefore, agree with the learned Assistant Judge that the appellants have not established the immemorial custom which they allege. Had they succeeded on this point, it might have been necessary to consider whether the custom was unreasonable or contrary to public policy (though strictly speaking that was not pleaded in the lower Courts). It would certainly have been necessary to consider the legal effect of the vesting of the Choudhari tank in the Municipality, and the question whether in any case the appellants could be granted any relief in this suit in which the legal owner is not a party. But as it is not necessary to decide these questions in the view we take of the case, and as they have not been very fully or effectively argued, we prefer to express no opinion.
Appeal dismissed with costs.
महाड सत्याग्रह को ऐतिहासिक क्यों महत्वपूर्ण मानना चाहिए?
महाड सत्याग्रह भारतीय इतिहास का एक ऐसा महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन है जिसने न केवल दलित समाज के अधिकारों की दिशा बदल दी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और मानव समानता की अवधारणा को भी नया आधार प्रदान किया। यह आंदोलन केवल एक तालाब से पानी पीने की घटना नहीं था, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता, छुआछूत और जातिगत दमन के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध की ऐतिहासिक शुरुआत था। इसी कारण इतिहासकार इसे आधुनिक भारत के सबसे निर्णायक सामाजिक आंदोलनों में शामिल करते हैं।
महाड सत्याग्रह को समझने के लिए उस समय की सामाजिक परिस्थिति को जानना आवश्यक है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग तेज हो रही थी, लेकिन सामाजिक स्तर पर समाज गहरे जातिगत विभाजन से ग्रस्त था। दलितों को सार्वजनिक स्थानों — जैसे तालाब, कुएँ, मंदिर, स्कूल, सड़क और धर्मशालाओं — से दूर रखा जाता था। उन्हें “अछूत” माना जाता था और उनकी छाया तक को अपवित्र समझा जाता था। यह स्थिति केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं थी बल्कि नगरों में भी समान रूप से विद्यमान थी।
इसी पृष्ठभूमि में दलित समाज के भीतर जागरूकता का उदय हुआ। उन्नीसवीं सदी में ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे समाज सुधारकों ने शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने जाति-व्यवस्था की आलोचना की और शोषित वर्गों को आत्मसम्मान का संदेश दिया। किंतु उनके आंदोलन अधिकतर सुधारवादी थे, जिनका उद्देश्य समाज को समझाकर परिवर्तन लाना था। दलित समाज स्वयं बड़े पैमाने पर संगठित होकर प्रत्यक्ष संघर्ष में अभी तक सामने नहीं आया था।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में यह स्थिति बदलने लगी जब डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भारतीय सार्वजनिक जीवन में उभरकर सामने आए। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने दलितों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को वैज्ञानिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से समझा। उनका मानना था कि समानता केवल नैतिक उपदेशों से नहीं बल्कि अधिकारों की प्राप्ति और सामाजिक संघर्ष से स्थापित होगी।
महाड नगर (महाराष्ट्र) में स्थित चावदार तालाब सरकारी रिकॉर्ड में सार्वजनिक संपत्ति घोषित था। 1924 में स्थानीय नगरपालिका ने यह निर्णय लिया कि सभी नागरिक, चाहे किसी भी जाति के हों, तालाब से पानी ले सकते हैं। लेकिन ऊँची जातियों के विरोध के कारण दलितों को वास्तविक रूप से इस अधिकार का उपयोग करने नहीं दिया गया। यही परिस्थिति महाड सत्याग्रह का कारण बनी।
मार्च 1927 में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में हजारों दलित महाड में एकत्र हुए। यह केवल सभा नहीं थी बल्कि एक सुविचारित सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम था। लोगों को अधिकारों के प्रति जागरूक किया गया, भाषणों के माध्यम से आत्मसम्मान और समानता का संदेश दिया गया, और फिर सामूहिक रूप से तालाब तक जाकर पानी पिया गया। यह कार्य प्रतीकात्मक होते हुए भी अत्यंत क्रांतिकारी था, क्योंकि पहली बार दलितों ने सार्वजनिक रूप से सामाजिक प्रतिबंध को तोड़ा। यही वह क्षण था जिसने इस आंदोलन को ऐतिहासिक बना दिया। सदियों से सामाजिक व्यवस्था ने दलितों को यह विश्वास दिलाया था कि वे निम्न और अयोग्य हैं, लेकिन महाड में उन्होंने स्वयं को समान नागरिक घोषित किया। यह आत्मसम्मान की क्रांति थी। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया और जाति-व्यवस्था पर खुली बहस शुरू हुई। हालाँकि इस आंदोलन का विरोध भी तीव्र हुआ। उच्च जाति के कुछ समूहों ने हिंसक प्रतिक्रिया दी, दलितों पर हमले हुए और तालाब को “शुद्ध” करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान किए गए। इससे स्पष्ट हुआ कि सामाजिक समानता का संघर्ष कितना कठिन था। लेकिन इन घटनाओं ने आंदोलन की ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ा दिया, क्योंकि अब यह केवल स्थानीय विवाद नहीं रहा बल्कि राष्ट्रीय प्रश्न बन गया।
महाड सत्याग्रह का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका वैचारिक प्रभाव था। दिसंबर 1927 में आयोजित दूसरे सम्मेलन में मनुस्मृति की प्रतियां जलाकर जातिगत असमानता के धार्मिक आधार का विरोध किया गया। यह कदम प्रतीकात्मक रूप से उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देना था जो जन्म के आधार पर मनुष्य की गरिमा तय करती थी। इस घटना ने सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दी।
अब प्रश्न उठता है कि क्या यह पहला दलित आंदोलन था?
ऐतिहासिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि इससे पहले भी दलितों के हित में सुधार आंदोलनों का अस्तित्व था, लेकिन महाड सत्याग्रह पहली बार ऐसा आंदोलन था जिसमें दलित समाज स्वयं संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ा हुआ। इसलिए इसे पहला व्यापक, संगठित और अधिकार-आधारित दलित आंदोलन माना जाता है। यहाँ नेतृत्व, भागीदारी और उद्देश्य — तीनों दलित समाज के भीतर से उत्पन्न हुए।
इस आंदोलन की ऐतिहासिक पहचान कई स्तरों पर दिखाई देती है। पहला, इसने सामाजिक न्याय को राजनीतिक मुद्दा बना दिया। अब स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक समानता का प्रश्न भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। दूसरा, इसने दलित समाज में संगठन और नेतृत्व की भावना विकसित की। तीसरा, इसने कानून और अधिकार की भाषा को लोकप्रिय बनाया — लोगों ने समझा कि नागरिक अधिकार जन्म से मिलते हैं, किसी जाति की अनुमति से नहीं। महाड सत्याग्रह का प्रभाव आगे चलकर भारतीय संविधान निर्माण में भी दिखाई देता है। समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और भेदभाव-निषेध जैसे सिद्धांत उसी विचारधारा से जुड़े हैं जिसे डॉ. आंबेडकर ने इस आंदोलन के माध्यम से व्यावहारिक रूप दिया। यह आंदोलन सामाजिक लोकतंत्र की अवधारणा का प्रारंभिक रूप था।
इस आंदोलन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी अत्यंत गहरा था। दलित समाज में आत्मविश्वास और सामूहिक पहचान विकसित हुई। लोगों ने यह महसूस किया कि संगठित संघर्ष से परिवर्तन संभव है। यही चेतना आगे चलकर मंदिर प्रवेश आंदोलनों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग और सामाजिक सुधार अभियानों का आधार बनी। इतिहास में महाड सत्याग्रह की पहचान इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह केवल विरोध का आंदोलन नहीं था, बल्कि नई सामाजिक व्यवस्था की घोषणा थी। यह आंदोलन बताता है कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से पूर्ण नहीं होता; सामाजिक समानता और मानव गरिमा उसके अनिवार्य अंग हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि महाड सत्याग्रह भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। यह दलितों के अधिकारों की पहली संगठित और व्यापक घोषणा थी, जिसने सामाजिक क्रांति की नींव रखी। इसने समाज को यह संदेश दिया कि समानता कोई दान नहीं बल्कि अधिकार है, और जब शोषित समुदाय स्वयं जागृत होकर संगठित होता है, तब इतिहास की दिशा बदल जाती है। इसी कारण महाड सत्याग्रह को आधुनिक भारत में दलित आंदोलन की वास्तविक शुरुआत और सामाजिक न्याय के संघर्ष की आधारशिला माना जाता है।
समानता एवं जल अधिकार : भारतीय संविधान का दृष्टिकोण
इस आंदोलन के बाद जब भारत के संविधान के निर्माण का समय आया और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माता ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया तब उन्होंने महाड सत्याग्रह आंदोलन का ध्यान रखते हुए की भारत के प्रत्येक राज्य और प्रत्येक राज्य के प्रत्येक जिले में ऐसा आंदोलन पानी के लिए अर्थात (सार्वजनिक कुआ तालाब व नदी के उपयोग) मंदिर प्रवेश के लिए सार्वजनिक सड़कों पर चलने को लेकर इस प्रकार का आंदोलन हमेशा नहीं हो सकता इसीलिए भारत में रहने वाले तमाम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जिन्हें अछूत के नाम से जाना जाता था उन्हें इन सभी सार्वजनिक स्थान को जीने सभी लोग उपयोग कर सकते हैं उनके उपयोग के लिए संविधान में ही व्यवस्था कर दी थी इसलिए भारत का संविधान सामाजिक समानता और मानव गरिमा पर आधारित है। जिसे आगे चलकर सर्वोच्च न्यायालय ने और विस्तृत कर दिया भारत के संविधान में नागरिकों को सार्वजनिक संसाधनों — विशेषकर पानी — तक समान पहुँच नहीं मिलेगी, तो लोकतंत्र अधूरा रहेगा। इन सार्वजनिक स्थलों के उपयोग के विषय में निम्न में अनुच्छेद के अनुसार वर्णन किया जा रहा है।
14. विधि के समक्ष समता- राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
15. धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध- (1) राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।
(2) कोई नागरिक केवल, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर-
(क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश, या
(ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग, के संबंध में किसी भी निर्योग्यता, दायित्व, निबंधन या शर्त के अधीन नहीं होगा।
(3) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
(4) इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
(5) इस अनुच्छेद या अनुच्छेद 19 के खंड (1) के उपखंड (छ) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए, विधि द्वारा, कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेंगी, जहाँ तक ऐसे विशेष उपबंध, अनुच्छेद 30 के खंड (1) में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं से भिन्न, शिक्षा संस्थाओं में, जिनके अन्तर्गत प्राइवेट शिक्षा संस्थाएं भी हैं, चाहे वे राज्य से सहायता प्राप्त हों या नहीं, प्रवेश से संबंधित हैं।]
17. अस्पृश्यता का अंत "अस्पृश्यता" का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। "अस्पृश्यता" से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा
21. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण- किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित् प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
यह भी जानना बहुत महत्वपूर्ण है कि उपरोक्त भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17 तथा 21 को सर्वोच्च न्यायालय ने किस तरह से विस्तृत किया और संविधान में दिए गए इन मूल अधिकारों का सर्वोच्च न्यायालय ने किस प्रकार से संरक्षण किया है
भारत के संविधान में मूल अधिकार भाग 3 के अंतर्गत अनुच्छेद 15 और 17 को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्न आदेश के साथ-साथ राज्य को मानव गरिमा की सुरक्षा के लिए भी दिशा निर्देश प्रतिपादित किया है जो कुछ इस प्रकार से है।
State of Karnataka v. Appa Balu Ingale & Others, AIR 1993 SC 1126, 1995 Supp (4) SCC 469, भारत का सर्वोच्च न्यायालय। यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(2) और अनुच्छेद 17 की व्याख्या से संबंधित एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसमें सार्वजनिक जलस्रोतों के उपयोग पर समान अधिकार के प्रश्न पर न्यायालय ने स्पष्ट संवैधानिक सिद्धांत स्थापित किए।
तथ्य
इस मामले में कर्नाटक राज्य के एक गाँव में अनुसूचित जाति के लोगों को गाँव के सार्वजनिक बोरवेल (जलस्रोत) से पानी लेने से रोका गया। उच्च जाति के व्यक्तियों ने सामाजिक परंपरा और छुआछूत की भावना के आधार पर दलितों को जलस्रोत के उपयोग से वंचित किया तथा उनके साथ दुर्व्यवहार किया। निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराया, परन्तु उच्च न्यायालय ने उन्हें संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
इस मामले में निचली अदालत ने दोषियों को सजा किया था किंतु राज्य के उच्च न्यायालय ने दोषियों को दोष मुक्त कर दिया तब राज्य की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की गई जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय का निर्णय निरस्त करते हुए दोषियों की सजा पुनः बहाल कर दी और कहा कि सार्वजनिक कुएँ, तालाब एवं जलस्रोतों पर सभी नागरिकों का समान अधिकार है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 15(2) निजी व्यक्तियों द्वारा किए गए भेदभाव पर भी लागू होता है और किसी को जाति के आधार पर सार्वजनिक सुविधा से वंचित करना असंवैधानिक है। न्यायालय ने यह भी कहा कि अस्पृश्यता का कोई भी रूप संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है और ऐसे कृत्य दंडनीय अपराध हैं, इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि वह समानता और मानव गरिमा की रक्षा सुनिश्चित करे।
E.P. Royappa v. State of Tamil Nadu, (1974) 4 SCC 3 : AIR 1974 SC 555, भारत का सर्वोच्च न्यायालय। यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता एवं समान संरक्षण) की व्याख्या से संबंधित एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसमें न्यायालय ने समानता के सिद्धांत को नई संवैधानिक दृष्टि प्रदान की।
तथ्य
ई.पी. रॉयप्पा तमिलनाडु राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) थे। राज्य सरकार ने उन्हें इस पद से हटाकर एक अन्य कम महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर दिया। रॉयप्पा ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा कि उनका स्थानांतरण मनमाना (arbitrary) है और यह राजनीतिक कारणों से किया गया है, जिससे उनके साथ असमान व्यवहार हुआ। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार की यह कार्रवाई अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है क्योंकि राज्य किसी व्यक्ति के साथ बिना उचित कारण के भेदभावपूर्ण या मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अनुच्छेद 14 की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि समानता का अर्थ केवल समान कानून होना नहीं है, बल्कि राज्य की प्रत्येक कार्रवाई न्यायसंगत, निष्पक्ष और गैर-मनमानी (non-arbitrary) होनी चाहिए। न्यायालय ने महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया कि “मनमानी (arbitrariness) ही असमानता है”, अर्थात यदि सरकारी निर्णय बिना उचित आधार के लिया गया है तो वह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना जाएगा, चाहे प्रत्यक्ष भेदभाव सिद्ध न भी हो। इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि सरकार या प्रशासन अपनी शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं कर सकता और हर प्रशासनिक निर्णय तर्कसंगत, पारदर्शी तथा न्यायपूर्ण होना आवश्यक है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 14 को केवल औपचारिक समानता से आगे बढ़ाकर न्यायपूर्ण शासन (fair governance) का संवैधानिक आधार बना दिया।
निष्कर्ष
इस आन्दोलन यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि उसे समय सन 1927 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग संगठित नहीं हुए और सामाजिक रूप से जागृत नहीं हुए होते तो जो आज जिस अधिकार से सभी लोग अपने मूल अधिकार के विषय में बहस करते हैं और चर्चा करते हैं माइक पड़कर सम्मेलनों में मीटिंगों में भाषण देते हैं यह अधिकार हमें नहीं होता बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने जो महाड सत्याग्रह लाखों लोगों के साथ अपने नेतृत्व में किया था वह सिर्फ पानी प्राप्त करने के लिए नहीं था क्योंकि उसे पानी को ना पीते तो उसे समय के लोग मरना जाते कुछ मुर्ख इस बात पर बहस करते हैं कि मामला सिर्फ पानी पीने का था यह पानी पीने का नहीं था अपने अधिकार को बताने और अधिकतर छीनने के विरुद्ध एक संघर्ष था यदि यह संघर्ष उसे समय के लोगों ने नहीं किया होता तो आज स्थिति वही होती की मंदिर में घुसने पर रोक तालाब में पानी पीने पर रोक सड़कों पर चलने पर रोक यह कहा जा सकता है कि भारत आजाद हो जाता पर अछूत कभी आजाद ना होता सही मायने में महाड सत्याग्रह भारत का पहला संगठित और सुनियोजित आंदोलन था इसके बाद बहुत सारे आंदोलन हुए कुछ आंदोलन बाबा साहब ने किया उनके बाद बहुत सारे महापुरुषों ने कई आंदोलन किया इस आंदोलन ने भारतीय समाज को यह सोचने के लिए बाध्य किया कि जन्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक संसाधनों से वंचित करना अन्यायपूर्ण और अमानवीय है। यही चेतना आगे चलकर संवैधानिक मूल्यों का आधार बनी और स्वतंत्र भारत ने समानता को अपने लोकतांत्रिक ढाँचे का केंद्रीय सिद्धांत स्वीकार किया।
भारतीय संविधान ने इस ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने के लिए अनुच्छेद 14, 15(2), 17 और 21 जैसे प्रावधानों के माध्यम से स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर कुओं, तालाबों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर सभी नागरिकों का समान अधिकार होगा। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों ने इन संवैधानिक आदर्शों को केवल लिखित सिद्धांत न रहने देकर व्यवहारिक अधिकार में परिवर्तित किया। न्यायालय ने बार-बार यह स्थापित किया कि समानता का अर्थ केवल कानून की समान भाषा नहीं बल्कि राज्य और समाज दोनों द्वारा निष्पक्ष, तर्कसंगत और गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार है। चाहे सार्वजनिक जलस्रोतों से दलितों को रोकने का मामला हो या मनमाने एवं भेदभावपूर्ण कानूनों की वैधता का प्रश्न, न्यायपालिका ने संविधान को सामाजिक परिवर्तन के जीवंत साधन के रूप में लागू किया है।
इस प्रकार ऐतिहासिक संघर्ष, संवैधानिक प्रावधान और न्यायालयीय व्याख्याएँ मिलकर यह संदेश देती हैं कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं होता, बल्कि सामाजिक समानता और मानव गरिमा की वास्तविक स्थापना में ही उसकी सफलता निहित है। आज सार्वजनिक संसाधनों पर समान पहुँच केवल कानूनी अधिकार नहीं बल्कि संवैधानिक नैतिकता का प्रतीक है, जो यह सुनिश्चित करती है कि समाज का कोई भी वर्ग भेदभाव, अस्पृश्यता या सामाजिक बहिष्कार का शिकार न बने। अतः महाड सत्याग्रह से लेकर आधुनिक न्यायिक निर्णयों तक की पूरी यात्रा भारतीय लोकतंत्र के उस निरंतर प्रयास को दर्शाती है जिसमें न्याय, समानता और मानवीय सम्मान को समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने का लक्ष्य निहित है।
अखिनेन्द्र प्रताप सिंह
एडवोकेट हाईकोर्ट इलाहाबाद
मो०- 9532112005
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