बीजेपी सरकार द्वारा बहुजनों तथा गरीबों को शिक्षा से वंचित करने का प्रयास विद्यालय मर्जर स्कीम के अंतर्गत

बीजेपी सरकार द्वारा बहुजनों तथा गरीबों को शिक्षा से वंचित करने का प्रयास विद्यालय मर्जर स्कीम के अंतर्गत 

शिक्षा का तात्पर्य है ज्ञान, कौशल, मूल्यों और दृष्टिकोणों का विकास, जो व्यक्ति को बौद्धिक, सामाजिक, और नैतिक रूप से सशक्त बनाता है। यह प्रक्रिया औपचारिक (स्कूल, कॉलेज) या अनौपचारिक (परिवार, समाज) हो सकती है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति को जीवन में आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और सक्षम बनाना है।
भारत में शिक्षा की व्यवस्था कोई वर्तमान समय की या 100-200 साल पहले की कोई नई व्यवस्था नहीं है बल्कि यह प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य यज्ञ हवन के साथ-साथ गुरुकुल प्रणाली में ऋषियों द्वारा धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था थी वैदिक काल: शिक्षा का उद्देश्य जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति था। गुरुकुल प्रणाली में शिष्य को वेद, शास्त्र, नैतिकता, और व्यावहारिक कौशलों का ज्ञान दिया जाता था। उपनिषद: शिक्षा को आत्म-ज्ञान (आत्मविद्या) और ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम माना गया, जो व्यक्ति को सांसारिक माया से मुक्त करता था। दर्शनशास्त्र: शिक्षा का लक्ष्य चरित्र निर्माण, बुद्धि विकास, और समाज के प्रति कर्तव्यों का बोध कराना था, लेकिन यह व्यवस्था मानवाधिकार के अंतर्गत नहीं थी क्योंकि प्राचीन काल में शिक्षा केवल वर्ण व्यवस्था के अंदर आने वाले तीन वर्णों को दी जाती थी जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जनों के लिए ही आरक्षित थी लेकिन बौद्ध धम्म के उदय होने के बाद बौद्ध कालीन शिक्षा पद्धति का विकास ईसा पूर्व 5वीं सदी से माना जाता है, जब बौद्ध धर्म का उद्भव हुआ। भगवान गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षा प्रणाली का प्रारंभ किया था। लेकिन भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षा प्रणाली में किसी भी वर्ग के लिए शिक्षा आरक्षित नहीं थी बल्कि भगवान गौतम बुद्ध के समय में शिक्षा सरल और सुलभ और सभी वर्गों के लिए निःशुल्क थी। भारत के लोग इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि भारत में शिक्षा प्रणाली है बहुत पुरानी है लेकिन इस बात पर बिल्कुल भी गर्व नहीं कर सकते कि भारत में जो प्राचीन शिक्षा प्रणाली थी वह विशेष वर्गों के लिए आरक्षित थी और आरक्षित सिर्फ वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों के लिए ही थी यह कोई गौरव की बात नहीं है बल्कि शर्म की बात है कि भारत का एक बहुत बड़ा जन समुदाय का हिस्सा जिसे शुद्र और अछूत के नाम से जाना जाता था और आज भी जाना जाता है यह वर्ग शिक्षा से वंचित रखा गया था क्योंकि इन्हें शिक्षा का कोई अधिकार नहीं था जैसा की मनु ने अपने मनुस्मृति में लिखा है कि-
मनुस्मृति, अध्याय 2, श्लोक 147:
संस्कृत: न शूद्राय मतिं दद्याद् नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्। न चास्य वेदाध्ययनं न संस्कारं न संन्यासम्॥
अनुवाद: शूद्र को न तो बुद्धि (वैदिक ज्ञान) देना चाहिए, न उसे अन्न का उच्छिष्ट, न हवि (यज्ञ में चढ़ाया भोजन), न उसे वेदों का अध्ययन कराना चाहिए, न संस्कार देना चाहिए, न संन्यास देना चाहिए।
मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 80:
संस्कृत: न शूद्राय समाचरेत् वेदमन्त्रं न चोच्छिष्टम्। न च दद्यात् तिलान् होमे न चैनं धर्ममाचरेत्॥
अनुवाद: शूद्र को न वेदमंत्र सुनाना चाहिए, न उच्छिष्ट भोजन देना चाहिए, न उसे यज्ञ में तिल देना चाहिए, न उसे धर्म (वैदिक शिक्षा) सिखाना चाहिए।
मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 51-56 (चांडाल और अन्य निम्न समूहों के लिए):
संस्कृत (श्लोक 51): चण्डालाः श्वपचाश्चैव ग्रामान्निर्हृत्य जीवनम्। विप्रवर्ज्यं च कर्म कुर्युर्नित्यं वैश्यवद् व्यवहारतः॥
अनुवाद: चांडाल और श्वपच (निम्न माने गए समूह) को गांव से बाहर रहना चाहिए और वैश्यों की तरह व्यवहार (सेवा कार्य) करना चाहिए। उन्हें ब्राह्मणों के कार्य (जैसे वेदाध्ययन) से दूर रखा जाए।
मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 126:
संस्कृत: शूद्रः पादेन संनादति न वाचति न चक्षुषा। न च वेदेन संनादति न चान्येनापि कर्मणा॥
अनुवाद: शूद्र न तो वाणी से, न आंखों से, न वेदों से, और न ही किसी अन्य कर्म से (उच्च वर्णों की तरह) शुद्ध होता है।
बुद्ध काल में शुद्रो तथा अछूतों के लिए शिक्षा की व्यवस्था सामान्य थी भगवान गौतम बुद्ध ने शुद्रो तथा अछूतों के समान रूप से सभी वर्णों के बराबर संघ में प्रवेश दिया तथा धम्म की शिक्षा दी जाती थी बौद्ध विहारों में शिक्षक भिक्षु होते थे, जिनमें शूद्र और अछूत भी शामिल हो सकते थे, यदि वे संघ में शामिल होकर उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त कर लेते थे। उपाली जैसे शूद्र भिक्षु विनय के शिक्षक बने, जो एक प्रकार का प्रोफेसर का दर्जा था। हालांकि, बुद्ध के समय में "प्रोफेसर" की आधुनिक अवधारणा नहीं थी। बौद्ध भिक्षु, जो धम्म और विनय में पारंगत थे, शिक्षक की भूमिका निभाते थे। इसमें शूद्र और अछूत भिक्षुओं की भागीदारी संभव थी। जिसका उदाहरण निम्न इस प्रकार से है।
बुद्ध का दृष्टिकोण और शिक्षा:
बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव को खारिज किया और सभी मनुष्यों की समानता पर बल दिया। उनके दर्शन और शिक्षाओं ने "अछूतों" सहित सभी के लिए शिक्षा और आध्यात्मिक विकास के द्वार खोले।
बुद्ध का शिक्षा आधारित समानता का सिद्धांत:
बुद्ध ने कहा कि व्यक्ति का मूल्य उसके जन्म (वर्ण) से नहीं, बल्कि उसके कर्म और नैतिक आचरण से निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए, मज्झिम निकाय (मज्झिम निकाय 93, अस्सलायन सुत्त) में बुद्ध ने ब्राह्मणों के साथ वाद-विवाद में वर्ण व्यवस्था की तर्कहीनता को चुनौती दी और कहा कि सभी मनुष्य समान हैं।
वसाल सुत्त (सुत्त निपात) में बुद्ध ने चांडालों को भी सम्मान दिया और उनके साथ भेदभाव को गलत ठहराया।
संघ में प्रवेश और शिक्षा:
बुद्ध ने अपने संघ (बौद्ध मठ) में सभी वर्णों और समुदायों, जिसमें शूद्र और "अछूत" (जैसे चांडाल) शामिल थे, को प्रवेश की अनुमति दी। उदाहरण:
उपाली, जो नाई (निम्न माना जाने वाला समुदाय) था, बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक बना और विनय (संघ के नियमों) का विशेषज्ञ बना।
सुनिता, एक चांडाल, बुद्ध के शिष्य बने और अर्हत (आध्यात्मिक मुक्ति) प्राप्त की (थेरगाथा, श्लोक 620-631)।
संघ में प्रवेश के बाद, भिक्षुओं को बुद्ध की शिक्षाओं (धम्म) और विनय का अध्ययन करने का अवसर मिलता था, जो एक प्रकार की औपचारिक शिक्षा थी। यह शिक्षा सभी के लिए खुली थी, चाहे उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
बुद्ध कालीन शिक्षा का स्वरूप:
बौद्ध शिक्षा में धम्म (नैतिकता, ध्यान, प्रज्ञा), चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, और विनय शामिल थे। यह वैदिक शिक्षा से अलग थी और सभी के लिए सुलभ थी।
बुद्ध ने मौखिक परंपरा के माध्यम से शिक्षण दिया, और उनके उपदेश (सुत्त) सभी के लिए खुले थे, जिसमें "अछूत" समुदाय भी शामिल थे।
बौद्ध विहार (मठ) शिक्षा के केंद्र बन गए, जहाँ भिक्षु और उपासक (गृहस्थ अनुयायी) दोनों को शिक्षा मिलती थी।
अछूतों के लिए शिक्षा की व्यवस्था:
औपचारिक शिक्षा: बुद्ध के समय में "अछूतों" के लिए कोई औपचारिक गुरुकुल-आधारित शिक्षा व्यवस्था नहीं थी, क्योंकि यह व्यवस्था ब्राह्मणवादी थी और उच्च वर्णों तक सीमित थी। लेकिन बौद्ध संघ ने इस कमी को पूरा किया।
बौद्ध संघ में शिक्षा: बुद्ध ने "अछूतों" को संघ में शामिल करके उन्हें धम्म और विनय की शिक्षा दी। यह शिक्षा न केवल आध्यात्मिक थी, बल्कि नैतिक और बौद्धिक विकास पर भी केंद्रित थी।
सामाजिक प्रभाव: बुद्ध के उपदेशों ने समाज के निचले वर्गों को आत्मविश्वास और सम्मान दिया। उदाहरण के लिए, सुनिता जैसे चांडालों की कहानियाँ (थेरगाथा) दिखाती हैं कि बुद्ध ने उन्हें न केवल शिक्षा, बल्कि सामाजिक स्वीकृति भी दी।
प्रमुख उदाहरण:
सुनिता (चांडाल): सुनिता एक चांडाल था, जिसे बुद्ध ने संघ में शामिल किया। उसने धम्म की शिक्षा प्राप्त की और अर्हत बन गया। थेरगाथा (श्लोक 620) में वह कहता है:
अनुवाद: "मैं निम्न कुल में पैदा हुआ, कचरा बीनने वाला था। बुद्ध ने मुझे धम्म सिखाया, और मैं अब मुक्त हूँ।"
उपाली (नाई): उपाली, जो निम्न माना जाता था, विनय पिटक का विशेषज्ञ बना और बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में गिना गया।
भारतीय सवर्ण समाज सुधारकों द्वारा शिक्षा पर कुछ इस प्रकार से विचार दिए हैं।
मोहनदास करमचंद गांधी जी ने शिक्षा को उनका विचार यात्रा की "हाथ, हृदय, और मस्तिष्क" के समग्र विकास का साधन माना। उनकी बुनियादी शिक्षा में शारीरिक श्रम, आत्मनिर्भरता, और नैतिकता पर जोर था।
शिक्षा पर विचार: शिक्षा को ग्रामीण और सामाजिक जरूरतों से जोड़ा जाना चाहिए। यह व्यक्ति को स्वावलंबी और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाए। मातृभाषा में शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। शिक्षा का लक्ष्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक समता है।
रवींद्रनाथ टैगोर ने शिक्षा को प्रकृति और रचनात्मकता के साथ जोड़ा। उनके अनुसार, शिक्षा को कठोर नियमों और किताबी ज्ञान से मुक्त होना चाहिए।
शिक्षा पर विचार: शिक्षा को बच्चे की रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति, और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देना चाहिए। प्रकृति के बीच खुली कक्षाओं में शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वतंत्र विचारक और विश्व नागरिक बनाना है।
      इन विचारकों के शिक्षा संबंधी विचार को ध्यान से पढ़ने से बिल्कुल भी ऐसा प्रतीत नहीं होता कि किसी भी शिक्षा संबंधी विचारकों का दलित शिक्षा पर कोई विचार रहा क्योंकि हमें ऐसा प्रतीत होता है कि इन सभी विचारों को दलितों की शिक्षा को लेकर कोई भी लगाव या विचार नहीं था। दूसरी भाषा में यह कहा जाएगी यह सभी समाज सुधारक सवर्ण समाज सुधारक थे इसी स्थान पर पिछड़ी जाति में जन्म महात्मा ज्योतिबा फुले का शिक्षा संबंधी विचार यह है कि-सामाजिक समता के लिए शिक्षा: महात्मा ज्योतिबा फुले ने शिक्षा को सामाजिक सुधार और दलित-शोषित वर्गों के उत्थान का साधन माना। इसी क्रम में ज्योतिबा फुले ने शिक्षा के प्रसार प्रसार के लिए 18 स्कूलों की स्थापना किया जिसमें दलित और निम्न वर्ग की लड़के लड़कियां पढ़ाई कर सके टूठन की पत्नी सावित्रीबाई फुले ने विधवाओं और वंचित महिलाओं के लिए शिक्षा और पुनर्वास के अवसर प्रदान किया उन्होंने बाल हत्या प्रतिबंध ग्रह की स्थापना की सावित्रीबाई फुले भारत की पहली दलित पढ़ी लिखी महिला के नाम से जाना जाता है इनको शिक्षित करने में उनके पति महात्मा ज्योतिबा फुले का सबसे बड़ा योगदान रहा।
शिक्षा पर विचार:: शिक्षा को जाति और लिंग भेद से मुक्त होना चाहिए। यह समाज में समानता और न्याय स्थापित करने का साधन है। स्त्रियों और निम्न वर्गों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए। उद्धरण: "शिक्षा के बिना मनुष्य का जीवन पशु के समान है।"
     संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. बी.आर. आंबेडकर शिक्षा पर अत्यधिक जोर दिया उनका यह मानना था कि शिक्षा वह हथियार है जो आपको अपने अधिकारों के लिए लड़ने की शक्ति देता है यह अज्ञानता के अंधेरे को दूर करता है और आपको आपके संवैधानिक अधिकारों की समझा देता है। इसी कारण से बाबा साहब अंबेडकर ने भारत के संविधान के निर्माण में उन्होंने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की नींव रखी और अनुच्छेद 46 के तहत अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के शिक्षा उन्नति को बढ़ावा देने का प्रावधान शामिल किया बाबासाहेब अंबेडकर ने मूकनायक व बहिष्कृत हितकारी संगठनों की स्थापना करनें के साथ-साथ बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पीपल एजुकेशन सोसाइटी 1945 की स्थापना की जिसके तहत सिद्धार्थ कॉलेज मुंबई और मिलिंद कॉलेज औरंगाबाद जैसे संस्थान शुरू किए गए इनका उद्देश्य दलित और वंचित वर्गों को उच्च शिक्षा प्रदान करना था। 
शिक्षा पर विचार: शिक्षा व्यक्ति को आत्म-सम्मान और स्वतंत्रता प्रदान करती है। यह सामाजिक भेदभाव और शोषण को समाप्त करने का साधन है। शिक्षा को तर्कसंगत, वैज्ञानिक, और समावेशी होना चाहिए। उद्धरण: "शिक्षित बनो, संगठित रहो, और संघर्ष करो।"
      जबकि भारत के संविधान मौलिक अधिकार भाग-3 के अनुच्छेद 21ए में निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान जब किया संशोधन 86वें संविधान संशोधन सन 2002 में किया गया था लेकिन संविधान में ही अनुच्छेद (2) राज्य द्वारा पोषित या राज्य निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा। और अनुच्छेद 30 (1) धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा। (1क) खंड (1) में निर्दिष्ट किसी अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा स्थापित और प्रशासित शिक्षा संस्था की संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधि बनाते समय, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी संपत्ति के अर्जन के लिए ऐसी विधि द्वारा नियत या उसके अधीन अवधारित रकम इतनी हो कि उस खंड के अधीन प्रत्याभूत अधिकार निर्बन्धित या निराकृत न हो जाए। तथा (2) शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में है। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व भाग-4 अनुच्छेद 41 राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा। भारत के संविधान अनुच्छेद 45 राज्य, सभी बालकों के लिए छह वर्ष की आयु पूरी करने तक, प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।] भारत के संविधान भाग 4-ए अनुच्छेद 46 राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा। तथा भारत के संविधान के मौलिक कर्तव्य 51 (ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे।
         सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रतिपादित कुछ आदेशों में शिक्षा को मौलिक अधिकार के अंतर्गत रखा है और सर्वोच्च न्यायालय ने यह बार-बार कहा है कि शिक्षा हर भारतीय का मौलिक अधिकार इस राज्य किसी भी स्थिति में नहीं छीन सकती और इसे समावेशी, सुलभ, और गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस आदेश में निजी मेडिकल कॉलेज मैं लगातार हो रही फीस वृद्धि को लेकर आदेश जारी किया है जो कुछ इस प्रकार से है। Miss Mohini Jain vs State of Karnataka and Others, AIR 1992 SC 1858, 1992 SCR (3) 658 कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत "जीवन के अधिकार" का हिस्सा है, क्योंकि शिक्षा के बिना गरिमापूर्ण जीवन संभव नहीं है। शिक्षा को मानवाधिकार का अभिन्न अंग माना गया, जो सामाजिक और आर्थिक समानता के लिए आवश्यक है। कैपिटेशन फीस को असंवैधानिक घोषित किया गया, क्योंकि यह शिक्षा के अधिकार को प्रतिबंधित करती थी। माननीय न्यायालय ने आगे या भी कहा कि "शिक्षा का अधिकार जीवन के अधिकार से अविभाज्य है। शिक्षा के बिना व्यक्ति अपने जीवन को गरिमा के साथ नहीं जी सकता।
Right to Education Act 2009 की शुरुआत माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आदेश "Unni Krishnan, J.P. & Others vs State of Andhra Pradesh & Others, (1993) 1 SCC 645 इस मामले में निजी शैक्षिक संस्थानों में फीस और प्रवेश प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठा था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का विचार ने स्पष्ट किया कि 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। शिक्षा को मानवाधिकार का हिस्सा माना गया, जो व्यक्ति को आत्म-सम्मान और सामाजिक प्रगति प्रदान करता है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि 14 वर्ष से अधिक आयु के लिए 
शिक्षा का अधिकार राज्य की आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है। इस फैसले ने अनुच्छेद 21-A (2002 में जोड़ा गया) और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education Act, 2009) की नींव रखी। शिक्षा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक है और यह सभी नागरिकों के लिए आवश्यक है। इसके उपरांत माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा को जरूरी मानते हुए तथा यह भी आदेश किया कि विद्यालयों में सुरक्षा मानकों का विशेष ध्यान होना चाहिए इसी के अनुक्रम में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश कि Avinash Mehrotra vs Union of India & Others, (2009) 6 SCC 398 इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्कूलों में सुरक्षा मानकों, विशेष रूप से अग्नि सुरक्षा, से संबंधित था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का विचार: कोर्ट ने माना कि सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में शिक्षा प्राप्त करना अनुच्छेद 21 और 21-A के तहत मानवाधिकार का हिस्सा है। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल तक पहुंच तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सुरक्षित शिक्षण वातावरण भी शामिल है। कोर्ट ने स्कूलों में अग्निशमन उपकरण और सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया। "शिक्षा का अधिकार सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को शामिल करता है।" Society for Unaided Private Schools of Rajasthan vs Union of India & Another, (2012) 6 SCC 1 इस मामले में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education Act), 2009 की संवैधानिकता और निजी स्कूलों में 25% सीटों के आरक्षण पर सवाल उठा था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का विचार कि Right to Education Act 2009 की धारा 12 (25% आरक्षण) को संवैधानिक माना और कहा कि शिक्षा का अधिकार सभी बच्चों के लिए मानवाधिकार है। यह विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों (जैसे दलित और अन्य SC/ST समुदायों) के लिए आवश्यक है। माननीय न्यायालय ने जोर दिया कि शिक्षा सामाजिक समानता और मानव विकास का आधार है।"शिक्षा का अधिकार मानवाधिकार का हिस्सा है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित बच्चों को समान अवसर प्रदान करता है।" Pramati Educational and Cultural Trust vs Union of India, (2014) 8 SCC 1 इस मामले में Right to Education Act 2009 के तहत अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों पर 25% आरक्षण की वैधता पर सवाल उठा था। सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः दोहराया कि अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा का अधिकार सभी बच्चों के लिए मानवाधिकार है। हालांकि, माननीय न्यायालय ने अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 30(1) के तहत छूट दी गई, लेकिन कोर्ट ने शिक्षा को सामाजिक समानता और मानव गरिमा का आधार माना।
       उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विलय (मर्जर) के लिए शासनादेश 16 जून 2025 को जारी किया गया था। इस शासनादेश को बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार द्वारा सभी जिला मजिस्ट्रेटों को जारी किया गया। शासनादेश की विशिष्ट संख्या (Government Order Number) उपलब्ध स्रोतों में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश में समाचार पत्रों के माध्यम से यह जानकारी प्राप्त हुई है कि जो प्राथमिक विद्यालय तथा उच्च प्राथमिक विद्यालय जिनमें 50 से कम छात्रों वाले स्कूलों को नजदीकी बड़े स्कूलों में विलय करने के लिए था बीजेपी सरकार की विद्यालय मर्जर स्कीम से दलित समुदाय पर पर बहुत गहरा असर पड़ेगा क्योंकि दलित समाज विद्यालय के मर्जर होने के कारण स्कूलों की संख्या कम होने से दलित समुदाय के बच्चों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, को स्कूल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। इससे ड्रॉपआउट (पढ़ाई को छोड़ने की) दर बढ़ सकती है, क्योंकि दलित परिवारों की आर्थिक स्थिति अक्सर कमजोर होती है, और परिवहन का खर्च वहन करना उनके लिए मुश्किल हो सकता है। यदि फिर भी यह बात मान भी ली जाए जैसा की बीजेपी भक्त कह रहे हैं कि सरकार दूरी को खत्म करने के लिए साधन (स्कूल वाहनों) की व्यवस्था करेगी तो मेरा अपना यह मानना है कि ऐसी व्यवस्था तो निशुल्क नहीं होगी उसका कुछ ना कुछ शुल्क अभिभावक को देना होगा जोकि आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अभिभावक देने में सक्षम नहीं होंगे तो इसका परिणाम पढ़ाई छोड़ने अर्थात ड्रॉपआउट की दरें है बढ़ जाएगी और यदि साधन (स्कूल वाहन) निशुल्क चलाए गए तो जो की बहुत कम संभावना है किया निशुल्क व्यवस्था लंबे समय तक सरकार द्वारा जारी रहेगी इस पर संदेह है क्योंकि भाजपा सरकार किसी भी योजना को बंद करने के लिए उसमें कोई ना कोई कमी या भ्रष्टाचार को बात कर उसे योजनाओं को बंद कर देती है ऐसा अक्सर देखा गया है तो इस निःशुल्क स्कूल वाहन योजना भी सरकार बंद कर सकती है इसका अधिक डर है। विद्यालय मर्जर के कारण जो विद्यालयों की दूरियां बढ़ेंगे उसे पर अभिभावक कम उम्र की लड़कियों को पढ़ाई से वंचित कर देंगे क्योंकि मर्जर किया गया विद्यालय दूर है और निशुल्क स्कूल वाहन जो मर्जर किए गए विद्यालय ले जाने वाला व्यक्ति उनके परिवार का या उनके गांव का नहीं है तथा एक समस्या और भी आ सकती है कि जब वाहन से विद्यालय जाना होगा तो अत्यधिक समय लगेगा कुछ लोग अधिक समय को ध्यान में रखते हुए भी पढ़ाई को छोड़ सकते हैं। उत्तर प्रदेश में विद्यालयों के मर्जर होने के बाद बड़े स्कूलों में दलित बच्चों को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है, जैसा कि पहले अमेठी और चित्रकूट जैसे क्षेत्रों में देखा गया है। मिड-डे मील कार्यक्रम में दलित बच्चों के साथ भेदभाव या रसोइया के रूप में दलित महिलाओं के खिलाफ विरोध के मामले सामने आए हैं। क्योंकि गांव में आज भी देखा गया है कि जो गांव की बस्तियां होती है वह बस्तियां एक विशेष वर्ग की जाति की ही होती है तो ऐसी स्थिति में छोटे बच्चे जिनकी आयु 5 साल से 14 साल के बीच में है वह इन समस्याओं को आसानी से नहीं समझ सकते विद्यालय यदि घर से दो से तीन किलोमीटर की दूरी पर होता है तो इन समस्याओं का सामना आसानी से किया जा सकता है क्योंकि विद्यालय में पढ़ने वाले व्यक्ति एक ही गांव एक ही मोहल्ले के होते हैं इसलिए ऐसी समस्याएं ज्यादातर नहीं आती यदि मोहल्ला और गांव बदल गया तो समस्याओं का आना स्वाभाविक है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 जो की सर्वोच्च न्यायालय के आदेश Unni Krishnan, J.P. & Others vs State of Andhra Pradesh & Others (1993) 1 SCC 645 के अनुपालन में इस अधिनियम को अधिनियमित किया गया था लेकिन बीजेपी सरकार मर्जर के नाम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन है। क्योंकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 21 से निकलता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि 14 वर्ष की आयु के बाद शिक्षा का अधिकार राज्य की आर्थिक क्षमता और विकास पर निर्भर करता है। इस फैसले ने अनुच्छेद 21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की नींव रखी गई लेकिन उत्तर प्रदेश भाजपा सरकार ने विद्यालयों को मर्जर करने का जो शासनादेश जारी किया है और अपने शासनादेश में यह बताया कि जिन विद्यालयों में 50 बच्चों से कम वाले प्राइमरी स्कूल को विलय करने का शासनादेश जारी किया जबकि केंद्र सरकार ने मार्च 2018 में संसद में लिखित जवाब में बताया था कि 2015-16 में उत्तर प्रदेश में 162645 प्राइमरी स्कूल थे इनमें 34151 स्कूलों में 50 से कम बच्चे पढ़ रहे थे लेकिन कुछ साल बाद यह आंकड़े और काम हो गए उत्तर प्रदेश सरकार योजना विभाग 2021-22 के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 1.4 ला‌ख प्राइमरी स्कूल 2015-16 के मुकाबले यह संख्या कम हो गई इन प्राइमरी स्कूलों में से 22016 स्कूल ऐसे थे जिनमें 50 से कम बच्चे हैं अब योगी सरकार ने मर्जर विद्यालयों स्कीम के अंतर्गत 5000 स्कूल को बंद करने और दलितों को शिक्षा से वंचित करने का एक अच्छा तरीका निकाला है।
       उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार जिस तरह से स्कूलों को मर्जर स्कीम योजना चला रही है और इस मर्जर के खेल में शिक्षा का निजीकरण होना स्वाभाविक है क्योंकि विद्यालयों के मर्जर होने से सरकारी स्कूलों की संख्या कम होगी, जिससे शिक्षा का दायरा सिकुड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के बंद होने पर अभिभावकों को निजी स्कूलों का रुख करना पड़ सकता है, जो महंगे होते हैं इस मर्जर के बाद सरकारी स्कूलों की पहुंच सीमित होने से निजी स्कूलों की मांग बढ़ेगी। उत्तर प्रदेश में पहले से ही निजी स्कूलों की संख्या बढ़ रही है, और उत्तर प्रदेश सरकार की मर्जर स्कीम शिक्षा के निजीकरण को तेज कर सकती है। जो की आर्थिक रूप से कमजोर दलित समुदाय के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक होगा। मर्जर को कुछ विशेषज्ञ सरकारी शिक्षा के निजीकरण की ओर कदम मानते हैं। निजी संस्थानों को बढ़ावा मिलने से शिक्षा एक व्यावसायिक सेवा बन सकती है, जिसका खर्च गरीब और दलित समुदाय वहन नहीं कर पाएंगे। उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में कम लागत वाले निजी स्कूल मौजूद हैं, जो अक्सर गुणवत्ताहीन शिक्षा प्रदान करते हैं। मर्जर के बाद दलित समुदाय के बच्चे इन्हीं स्कूलों की ओर धकेले जा सकते हैं। विद्यालयों का मर्जर दलितों को शिक्षा से वंचित करने के लिए भाजपा सरकार ने एक षड्यंत्र रचा है इस षड्यंत्र के तहत इन विद्यालयों को मर्जर किया जा रहा है क्योंकि सरकार को अच्छे से इस बात की जानकारी है कि ग्रामीण स्तर पर उत्तर प्रदेश का 80% हिस्सा निवास करता है और इस 80% हिस्से में 30% दलित वर्ग जो आर्थिक रूप से कमज़ोर है यदि इन्हें शिक्षा से वंचित कर दिया गया इनका भविष्य अंधकार मय हो जाएगा इतना ही नहीं अशिक्षित वर्ग कभी भी अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा सकते हैं आज वर्तमान समय में बीजेपी के खिलाफ जितने भी मोर्चो खोले गए हैं वह ज्यादातर दलितों द्वारा किए हुए हैं चाहे वह आरक्षण का मुद्दा रहा हो, चाहे दलित उत्पीड़न की बात रही हो, चाहे बौद्ध धम्म में प्रवेश की बात रही हो, चाहे महंगाई का मुद्दा रहा हो या कोई भी मुद्दे रहे हो दलितों द्वारा ही भाजपा सरकार की खिलाफत की गई तो बीजेपी सरकार अब नहीं चाहती कि दलित समुदाय पढ़ लिखकर सवर्ण समुदाय के विरुद्ध कोई कार्य करें क्योंकि पढ़ा लिखा वर्ग अपना अधिकार जानता है और अपने अधिकारों के लिए वह कानूनी लड़ाई भी लड़ने को तैयार होता है इसी कारण से बीजेपी सरकार उत्तर प्रदेश में विद्यालयों को मर्जर कर रही है और मर्जर सिर्फ इस नाम पर हो रहे हैं कि विद्यालयों में छात्रों की संख्या 50 से कम जबकि यह बात पूरी तरह से गलत है यदि छात्रों की संख्या नहीं बढ़ रही है तो इसका कारण सरकार खुद है। जबकि निजी विद्यालयों में छात्रों की संख्या पर्याप्त से अधिक है ऐसा क्यों जबकि निजी विद्यालयों को सरकार से विद्यालय खोलने की परमिशन लेनी पड़ती है पर सरकार को किससे परमिशन लेनी है सरकार को तो किसी से परमिशन नहीं लेनी है वह अपने स्कूल में जिस प्रकार से चाहे वह फेर बदल कर सकती है सरकार को चाहिए कि निजी स्कूलों से सरकारी स्कूलों की प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए जैसे कि सभी सरकारी विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम में होना चाहिए निजी विद्यालयों में डिजिटाइजेशन हो चुका है उसे तरह सरकारी स्कूलों को भी डिजिटाइजेशन करना चाहिए लाइब्रेरी और लैबोरेट्री होना चाहिए इसके साथ-साथ खेल जैसे कराटे, बैडमिंटन, फुटबॉल, वॉलीबॉल, कबड्डी और कुश्ती जैसे इन खेलों का शिक्षक होना चाहिए सरकारी स्कूलों में खेल शिक्षक की भर्ती होती ही नहीं जबकि निजी विद्यालय में उनकी व्यवस्था पर्याप्त मात्रा में होती है स्वच्छ पानी की व्यवस्था, शौचालय और बिजली की व्यवस्थाएं होनी चाहिए और इसके साथ-साथ प्रत्येक सत्र के प्रारंभ में सरकारी विद्यालयों को के सभी अध्यापकों को यह निश्चित आदेश दें कि अपने विद्यालय के लगभग 3 किलोमीटर की दूरी के रेडियस में घर-घर जाकर गांव के लोगों से मिलकर अपने सरकारी विद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित करें और आपके विद्यालय में क्या-क्या चल रहा है कौन-कौन सी स्कीम है कैसी व्यवस्थाएं हैं उसके विषय में जाकर बताएं जैसा कि निजी शिक्षण संस्थान करते हैं इतना ही नहीं यदि जिन विद्यालयों में 50 छात्रों से कम छात्र होते हैं तो उसे विद्यालय की जिम्मेदारी वहां के टीचर की होनी चाहिए ना कि विद्यालय को मर्जर कर देने से या समस्या हल हो जाएगी उत्तर प्रदेश में शिक्षक को जितना वेतन मिलता है उतना वेतन उत्तर प्रदेश के किसी भी सरकारी कर्मचारियों को नहीं मिलता तो सरकारी अध्यापकों की यह जिम्मेदारी होती है कि उनके क्षेत्र के 3 किलोमीटर के रेडियस से सभी बच्चे उसे विद्यालय में पढ़ने आए।
निष्कर्ष - विद्यालयों का मर्जर इसलिए नहीं हो रहा है कि विद्यालयों में छात्रों की संख्या कम है बल्कि इसलिए हो रहा है कि दलित शिक्षित ना हो क्योंकि सरकार को अच्छे से इस बात की जानकारी है कि सरकारी प्राथमिक विद्यालय उच्च प्राथमिक विद्यालय या सभी सरकारी विद्यालयों का लाभ सबसे ज्यादा दलित समुदाय ही लेता है क्योंकि इस समुदाय के पास आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती यदि ऐसा ना होता तो बहुजन समाज पार्टी 2007 से 12 अपने शासनकाल में संपूर्ण उत्तर प्रदेश में 9 मेडिकल कॉलेज, 12 इंजीनियरिंग कॉलेज, 4 होम्योपैथिक कॉलेज, 25 से अधिक पॉलिटेक्निक कॉलेज 4 पैरामेडिकल कॉलेज 6 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय 200 से अधिक डिग्री कॉलेज 200 से अधिक इंटर कॉलेज 572 हाई स्कूल की स्थापना नहीं की होती क्योंकि बसपा सरकार को इस बात की अच्छी जानकारी थी की इन विद्यालयों का लाभ वही व्यक्ति दे सकता है जो आर्थिक रूप से कमजोर है और आर्थिक रूप से ज्यादातर कमजोर सिर्फ दलित समुदाय ही है इसीलिए वर्तमान बीजेपी सरकार ने मर्जर स्कीम शुरू कर दी और इस स्कीम के तहत सरकारी विद्यालयों को बंद करने की योजना शुरू कर दी इस मर्जर स्कीम से शिक्षा का निजीकरण व्यवसायीकरण होना तय है क्योंकि अभिभावक जो आर्थिक रूप से थोड़ा सा भी मजबूत है वह अपने बच्चों को अधिक दूरी वाले विद्यालयों में नहीं पढ़ाएंगे वह पैसा देकर प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों का एडमिशन करवा देंगे लेकिन यह ग्रामीण स्तर पर मात्र 10% ही होगा बाकी 90% लोग बीजेपी सरकार की मर्जर स्कीम का शिकार होंगे इंटरनेट के अनुसार मिली जानकारी के मुताबिक भारत अमेरिका इंग्लैंड और रूस की साक्षरता दरों का तुलनात्मक विवरण देखा तो बहुत हैरानी की बात है भारत की साक्षरता दर UNESCO 2021 के अनुसार 74.4% है जबकि पुरुष साक्षरता दर 82.4% और महिला साक्षरता दर 65.8% है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की साक्षरता दर UNESCO के अनुसार 2019 से 2021 लगभग 99% है इसी प्रकार इंग्लैंड की भी साक्षरता दर UNESCO के अनुसार लगभग 99% है जोकि United Kingdom, England सरकार के आंकड़े 2019 से 2021 का है। इसी प्रकार से रूस की भी साक्षरता दर UNESCO 2018 से 2021 के अनुसार 99.7% है जो विश्व की सबसे अधिक साक्षरता दर है और शिक्षा प्रणाली अत्यधिक संचारित और केंद्रित है। जबकि भारत सरकार और राज्य की सरकार को चाहिए कि इस मर्जर व्यवस्था से देश का साक्षरता दर 74.4% जो अभी है और अन्य देशों में लगभग 99% साक्षरता दर है अभी तो भारत में 74.4% साक्षरता दर पहुंच गई है लेकिन इसी तरह मर्जर व्यवस्था चालू रही तो भारत के साक्षरता दर और काम हो जाएगी सरकार को चाहिए कि सरकारी विद्यालयों को अपडेट करें और आधुनिक कृत करें सुविधा और व्यवस्थाओं से लैस करें छात्रों की संख्या कम ना हो इसके लिए नया कानून बनाएं और जिसका लाभ और हानि की जिम्मेदारी उसे विद्यालय के अध्यापक और प्रधानाध्यापक की होनी चाहिए छात्रों की संख्या के अनुसार ही विद्यालय के अध्यापक और प्रधानाध्यापक का प्रमोशन और इंक्रीमेंट मिलना चाहिए।

     अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
एडवोकेट हाईकोर्ट इलाहाबाद
   मो०नं०-9532 11 2005



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